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नफ़स अम्बालवी

1961 | अमबाला, भारत

ग़ज़ल 21

शेर 24

उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है

मुझे यक़ीं है कि ये आसमान कुछ कम है

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हमारी राह से पत्थर उठा कर फेंक मत देना

लगी हैं ठोकरें तब जा के चलना सीख पाए हैं

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अब उन की ख़्वाब-गाहों में कोई आवाज़ मत करना

बहुत थक-हार कर फ़ुटपाथ पर मज़दूर सोए हैं

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चित्र शायरी 1

उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है मुझे यक़ीं है कि ये आसमान कुछ कम है

 

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