शराब पर 20 मशहूर शेर

अगर आपको बस यूँही बैठे बैठे ज़रा सा झूमना है तो शराब शायरी पर हमारा ये इन्तिख़ाब पढ़िए। आप महसूस करेंगे कि शराब की लज़्ज़त और इस के सरूर की ज़रा सी मिक़दार उस शायरी में भी उतर आई है। ये शायरी आपको मज़ा तो देगी ही, साथ में हैरान भी करेगी कि शराब जो ब-ज़ाहिर बे-ख़ुदी और सुरूर बख़्शती है, शायरी मैं किस तरह मानी की एक लामहदूद कायनात का इस्तिआरा बन गई है।

कुछ भी बचा कहने को हर बात हो गई

आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई

निदा फ़ाज़ली

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में

the tavern does not even give that much wine to me

that I was wont to waste in the goblet casually

the tavern does not even give that much wine to me

that I was wont to waste in the goblet casually

दिवाकर राही

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'

जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

we came to the tavern all gay and frolicsome

now having drunk the wine, somber have become

we came to the tavern all gay and frolicsome

now having drunk the wine, somber have become

फ़िराक़ गोरखपुरी

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा हो

Priest I know this is a mosque, let me drink inside

Or point me to a place where God does not reside

Priest I know this is a mosque, let me drink inside

Or point me to a place where God does not reside

अज्ञात

तुम होश में हो हम होश में हैं

चलो मय-कदे में वहीं बात होगी

neither are you in your senses nor am I in mine

let us now go to the tavern and talk while we have wine

neither are you in your senses nor am I in mine

let us now go to the tavern and talk while we have wine

बशीर बद्र

पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगी

साक़ी ने जैसे प्यास मिला दी शराब में

अज्ञात

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

मिर्ज़ा ग़ालिब

शिकन डाल जबीं पर शराब देते हुए

ये मुस्कुराती हुई चीज़ मुस्कुरा के पिला

अब्दुल हमीद अदम

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ

क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को मुँह लगा

छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद

हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं

you've never drunk O hapless priest

The joys of wine how will you see

you've never drunk O hapless priest

The joys of wine how will you see

दाग़ देहलवी

पिला दे ओक से साक़ी जो हम से नफ़रत है

पियाला गर नहीं देता दे शराब तो दे

if you despise me pour into my cupped palms, it is fine

give me not a glass but then, at least do give me wine

if you despise me pour into my cupped palms, it is fine

give me not a glass but then, at least do give me wine

मिर्ज़ा ग़ालिब

साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं

ज़हर दे दे अगर शराब नहीं

दाग़ देहलवी

पहले शराब ज़ीस्त थी अब ज़ीस्त है शराब

कोई पिला रहा है पिए जा रहा हूँ मैं

जिगर मुरादाबादी

'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला

उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी कभी

पीता हूँ रोज़-ए-अब्र शब-ए-माहताब में

मिर्ज़ा ग़ालिब

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है

रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे

let the cup and flask of wine remain in front of me

though my hands are motionless, my eyes as yet can see

let the cup and flask of wine remain in front of me

though my hands are motionless, my eyes as yet can see

मिर्ज़ा ग़ालिब

तर्क-ए-मय ही समझ इसे नासेह

इतनी पी है कि पी नहीं जाती

शकील बदायुनी

मोहतसिब फेंक मिरे मोहतसिब फेंक

ज़ालिम शराब है अरे ज़ालिम शराब है

जिगर मुरादाबादी

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