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अज्ञात

अज्ञात के शेर

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हम ने उस को इतना देखा जितना देखा जा सकता था

लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा हो

ख़ुदा ही मिला विसाल-ए-सनम इधर के हुए उधर के हुए

रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम इधर के हुए उधर के हुए

अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त

हमीं अस्त हमीं अस्त हमीं अस्त

कभी तेरा दर कभी दर-ब-दर कभी 'अर्श पर कभी फ़र्श पर

ग़म-ए-'आशिक़ी तिरा शुक्रिया मैं कहाँ कहाँ से गुज़र गया

सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं

अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं

मुंतज़िर सब मिरे ज़वाल के हैं

मेरे अहबाब भी कमाल के हैं

मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे

कि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ओ-गुलज़ार होता है

अब मैं समझा तिरे रुख़्सार पे तिल का मतलब

दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है

व्याख्या

रुख़्सार अर्थात गाल, दौलत-ए-हुस्न अर्थात हुस्न की दौलत, दरबान अर्थात रखवाला। यह शे’र अपने विषय की नवीनता के कारण लोकप्रिय है। शे’र में केन्द्रीय स्थिति “रुख़्सार पर तिल” को प्राप्त है क्योंकि उसी के अनुरूप शायर ने विषय पैदा किया है। प्रियतम के गाल को दरबान(रखवाला) से तुलना करना शायर का कमाल है। और जब दौलत-ए-हुस्न कहा तो जैसे प्रियतम के सरापा को आँखों के सामने लाया हो।

रुख़्सार पर तिल होना सौन्दर्य का एक प्रतीक समझा जाता है। मगर चूँकि प्रियतम सुंदरता की आकृति है इस विशेषता के अनुरूप शायर ने यह ख़्याल बाँधा है कि जिस तरह बुरी नज़र से सुरक्षित रखने के लिए ख़ूबसूरत बच्चों के गाल पर काला टीका लगाया जाता है उसी तरह मेरे प्रियतम को लोगों की बुरी दृष्टि से बचाने के लिए ख़ुदा ने उसके गाल पर तिल रखा है। और जिस तरह धन-दौलत को लुटेरों से सुरक्षित रखने के लिए उस पर प्रहरी (रखवाले) बिठाए जाते हैं, ठीक उसी तरह ख़ुदा ने मेरे महबूब के हुस्न को बुरी नज़र से सुरक्षित रखने के लिए उसके गाल पर तिल बनाया है।

शफ़क़ सुपुरी

शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे

ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे

फिर यूँ हुआ कि सब्र की उँगली पकड़ के हम

इतना चले कि रास्ते हैरान रह गए

जिन के किरदार से आती हो सदाक़त की महक

उन की तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं

गुज़र तो जाएगी तेरे बग़ैर भी लेकिन

बहुत उदास बहुत बे-क़रार गुज़रेगी

ये तो इक रस्म-ए-जहाँ है जो अदा होती है

वर्ना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है

की मोहब्बत तो सियासत का चलन छोड़ दिया

हम अगर इश्क़ करते तो हुकूमत करते

कई जवाबों से अच्छी है ख़ामुशी मेरी

जाने कितने सवालों की आबरू रक्खे

लोग काँटों से बच के चलते हैं

मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं

ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिए

रूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है

बे पिए ही शराब से नफ़रत

ये जहालत नहीं तो फिर क्या है

जान लेनी थी साफ़ कह देते

क्या ज़रूरत थी मुस्कुराने की

जब तक बिका था तो कोई पूछता था

तू ने ख़रीद कर मुझे अनमोल कर दिया

दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई

लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया

बेचैन इस क़दर था कि सोया रात भर

पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर

हसीन चेहरे की ताबिंदगी मुबारक हो

तुझे ये साल-गिरह की ख़ुशी मुबारक हो

उन के होने से बख़्त होते हैं

बाप घर के दरख़्त होते हैं

किसी को कैसे बताएँ ज़रूरतें अपनी

मदद मिले मिले आबरू तो जाती है

मगस को बाग़ में जाने दीजो

कि नाहक़ ख़ून परवाने का होगा

देखा कोहकन कोई फ़रहाद के बग़ैर

आता नहीं है फ़न कोई उस्ताद के बग़ैर

ईद आई तुम आए क्या मज़ा है ईद का

ईद ही तो नाम है इक दूसरे की दीद का

हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए

तू मिरी जान किस गुमान में है

तुम हँसो तो दिन निकले चुप रहो तो रातें हैं

किस का ग़म कहाँ का ग़म सब फ़ुज़ूल बातें हैं

वही क़ातिल वही शाहिद वही मुंसिफ़ ठहरे

अक़रबा मेरे करें क़त्ल का दावा किस पर

मुझ को छाँव में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा

मैं ने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाईं में

कुछ ख़ुशियाँ कुछ आँसू दे कर टाल गया

जीवन का इक और सुनहरा साल गया

ये बे-ख़ुदी ये लबों की हँसी मुबारक हो

तुम्हें ये सालगिरह की ख़ुशी मुबारक हो

ख़ामोश मिज़ाजी तुम्हे जीने नहीं देगी

इस दौर में जीना है तो कोहराम मचा दो

शाम होते ही चराग़ों को बुझा देता हूँ

दिल ही काफ़ी है तिरी याद में जलने के लिए

देखा हिलाल-ए-ईद तो आया तेरा ख़याल

वो आसमाँ का चाँद है तू मेरा चाँद है

ये चमन यूँही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें

अपनी अपनी बोलियाँ सब बोल कर उड़ जाएँगी

ख़ुदा करे ढले धूप तेरे चेहरे की

तमाम उम्र तिरी ज़िंदगी की शाम हो

मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी

अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं

आप आए तो बहारों ने लुटाई ख़ुश्बू

फूल तो फूल थे काँटों से भी आई ख़ुश्बू

किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं

अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश

फ़रिश्ते हश्र में पूछेंगे पाक-बाज़ों से

गुनाह क्यूँ किए क्या ख़ुदा ग़फ़ूर था

पलकों की हद को तोड़ के दामन पे गिरा

इक अश्क मेरे सब्र की तौहीन कर गया

मिरी नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी है ग़ैरों ने

मरे थे जिन के लिए वो रहे वज़ू करते

पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगी

साक़ी ने जैसे प्यास मिला दी शराब में

दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिल

जिस शख़्स ने हालात का रुख़ मोड़ दिया हो

तुम समुंदर की बात करते हो

लोग आँखों में डूब जाते हैं

रफ़ीक़ों से रक़ीब अच्छे जो जल कर नाम लेते हैं

गुलों से ख़ार बेहतर हैं जो दामन थाम लेते हैं

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