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रद करें डाउनलोड शेर

किताब पर 20 बेहतरीन शेर

किताब को मर्कज़ में रख

कर की जाने वाली शायरी के बहुत से पहलू हैं। किताब महबूब के चेहरे की तशबीह में भी काम आती है और आम इंसानी ज़िंदगी में रौशनी की एक अलामत के तौर पर भी। किताब के इस हैरत-कदे में दाख़िल होइए और लुत्फ उठाइये।

टॉप 20 सीरीज़

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें

इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

जाँ निसार अख़्तर

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो

ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

निदा फ़ाज़ली

इल्म में भी सुरूर है लेकिन

ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर कहता है कि पढ़ाई-लिखाई और समझ से खुशी मिलती है, फिर भी वह पूरी तृप्ति नहीं देती। “स्वर्ग” और “हूर” के प्रतीक से बात साफ होती है कि सिर्फ बौद्धिक सुख ठंडा और अधूरा रह सकता है। भाव यह है कि जीवन की पूर्णता के लिए प्रेम, सौंदर्य या आत्मिक रस भी चाहिए।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर कहता है कि पढ़ाई-लिखाई और समझ से खुशी मिलती है, फिर भी वह पूरी तृप्ति नहीं देती। “स्वर्ग” और “हूर” के प्रतीक से बात साफ होती है कि सिर्फ बौद्धिक सुख ठंडा और अधूरा रह सकता है। भाव यह है कि जीवन की पूर्णता के लिए प्रेम, सौंदर्य या आत्मिक रस भी चाहिए।

अल्लामा इक़बाल

इल्म की इब्तिदा है हंगामा

इल्म की इंतिहा है ख़ामोशी

फ़िरदौस गयावी

तुझे किताब से मुमकिन नहीं फ़राग़ कि तू

किताब-ख़्वाँ है मगर साहिब-ए-किताब नहीं

Interpretation: Rekhta AI

अल्लामा इक़बाल केवल पढ़ने और वास्तव में जानने का फर्क बताते हैं। यहाँ “किताब” ज्ञान और मार्गदर्शन का रूपक है; “किताब-ख़्वाँ” वह है जो शब्दों तक सीमित रह जाए। “साहिब-ए-किताब नहीं” का मतलब है कि ज्ञान अभी जीवन, सोच और आचरण का हिस्सा नहीं बना। भाव यह है कि अध्ययन से आगे बढ़कर अर्थ को जीना ज़रूरी है।

Interpretation: Rekhta AI

अल्लामा इक़बाल केवल पढ़ने और वास्तव में जानने का फर्क बताते हैं। यहाँ “किताब” ज्ञान और मार्गदर्शन का रूपक है; “किताब-ख़्वाँ” वह है जो शब्दों तक सीमित रह जाए। “साहिब-ए-किताब नहीं” का मतलब है कि ज्ञान अभी जीवन, सोच और आचरण का हिस्सा नहीं बना। भाव यह है कि अध्ययन से आगे बढ़कर अर्थ को जीना ज़रूरी है।

अल्लामा इक़बाल

यही जाना कि कुछ जाना हाए

सो भी इक उम्र में हुआ मालूम

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि जीवन भर की खोज के बाद जो सबसे बड़ा ‘ज्ञान’ मिलता है, वह अपनी अज्ञानता का एहसास है। “हाय” पछतावे और दुख को दिखाता है कि इतनी देर में यह बात खुली। दूसरी पंक्ति में “उम्र” उस लंबे समय का संकेत है जिसमें घमंड और पक्का भरोसा धीरे-धीरे टूटता है। भाव यह है कि अंत में विनम्रता ही सच्ची समझ बनकर रह जाती है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि जीवन भर की खोज के बाद जो सबसे बड़ा ‘ज्ञान’ मिलता है, वह अपनी अज्ञानता का एहसास है। “हाय” पछतावे और दुख को दिखाता है कि इतनी देर में यह बात खुली। दूसरी पंक्ति में “उम्र” उस लंबे समय का संकेत है जिसमें घमंड और पक्का भरोसा धीरे-धीरे टूटता है। भाव यह है कि अंत में विनम्रता ही सच्ची समझ बनकर रह जाती है।

मीर तक़ी मीर

काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के

दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया

बशीर बद्र

हद से बढ़े जो इल्म तो है जहल दोस्तो

सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं

ख़ुमार बाराबंकवी

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए

सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को

नज़ीर बाक़री

क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो

हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरें हैं

एजाज़ तवक्कल

कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए

कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे

हस्तीमल हस्ती

चेहरा खुली किताब है उनवान जो भी दो

जिस रुख़ से भी पढ़ोगे मुझे जान जाओगे

अज्ञात

आदमिय्यत और शय है इल्म है कुछ और शय

कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा

Interpretation: Rekhta AI

शायर यहाँ ज्ञान और इंसानियत (अच्छे व्यवहार) के बीच का अंतर समझा रहे हैं। उनका कहना है कि सिर्फ़ ज्ञान पा लेने से कोई अच्छा इंसान नहीं बन जाता, जैसे तोते को रटाने के बाद भी वह जानवर ही रहता है। असली महत्त्व अच्छे स्वभाव और मनुष्यता का है, केवल रटने या पढ़ने का नहीं।

Interpretation: Rekhta AI

शायर यहाँ ज्ञान और इंसानियत (अच्छे व्यवहार) के बीच का अंतर समझा रहे हैं। उनका कहना है कि सिर्फ़ ज्ञान पा लेने से कोई अच्छा इंसान नहीं बन जाता, जैसे तोते को रटाने के बाद भी वह जानवर ही रहता है। असली महत्त्व अच्छे स्वभाव और मनुष्यता का है, केवल रटने या पढ़ने का नहीं।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

इब्तिदा ये थी कि मैं था और दा'वा इल्म का

इंतिहा ये है कि इस दा'वे पे शरमाया बहुत

जगन्नाथ आज़ाद

रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ

पढ़ता था मैं किताब यही हर क्लास में

शकेब जलाली

किधर से बर्क़ चमकती है देखें वाइज़

मैं अपना जाम उठाता हूँ तू किताब उठा

जिगर मुरादाबादी

बारूद के बदले हाथों में जाए किताब तो अच्छा हो

काश हमारी आँखों का इक्कीसवाँ ख़्वाब तो अच्छा हो

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

मिरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज था

मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे

लियाक़त जाफ़री

किताब खोल के देखूँ तो आँख रोती है

वरक़ वरक़ तिरा चेहरा दिखाई देता है

अहमद अक़ील रूबी
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