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इश्क़ पर 20 बेहतरीन शेर

इश्क़ आरम्भ से ही उर्दू

शायरी का पसंदीदा विषय रहा है। रेख़्ता ने इस विषय पर 20 बेहतरीन अशआर का चयन किया है | चयन शेर की लोकप्रियता एवं स्तर पर आधारित है | हमें स्वीकार है के इस चयन में कईं बेहतरीन अशआर शामिल होने से रह गए होंगे | किसी बेहतर शेर का सुझाव कमेंट सेक्शन द्वारा किया जा सकता है | उचित शेर को 20 बेहतरीन अशआर की सूचि में शामिल किया जा सकता है | रेख़्ता सूचि के किसी संशोधित स्वरुप में आप की भागीदारी का अभिलाषी है |

टॉप 20 सीरीज़

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर यह कहना चाहता है कि इश्क़ के चक्कर में पड़कर वह अब किसी काम के नहीं रहे। वह एक दबी हुई आह के साथ याद करते हैं कि प्यार में पड़ने से पहले वो भी एक बहुत हुनरमंद और ज़रूरी इंसान थे, लेकिन अब सिर्फ़ नाम के रह गए हैं।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर यह कहना चाहता है कि इश्क़ के चक्कर में पड़कर वह अब किसी काम के नहीं रहे। वह एक दबी हुई आह के साथ याद करते हैं कि प्यार में पड़ने से पहले वो भी एक बहुत हुनरमंद और ज़रूरी इंसान थे, लेकिन अब सिर्फ़ नाम के रह गए हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

Interpretation: Rekhta AI

यह शे’र बताता है कि जो सीमा हमें आख़िरी लगती है, उसके आगे भी नई मंज़िलें होती हैं। “सितारे” यहाँ ऊँचाई और पहुँच की सीमा का संकेत हैं, और उनसे आगे बढ़ने की प्रेरणा है। दूसरी पंक्ति में प्रेम को निरंतर परीक्षा माना गया है, जिसमें हर कदम पर नया साहस और धैर्य चाहिए। भाव है—आशा के साथ आगे बढ़ते रहो, मंज़िल अभी बाकी है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शे’र बताता है कि जो सीमा हमें आख़िरी लगती है, उसके आगे भी नई मंज़िलें होती हैं। “सितारे” यहाँ ऊँचाई और पहुँच की सीमा का संकेत हैं, और उनसे आगे बढ़ने की प्रेरणा है। दूसरी पंक्ति में प्रेम को निरंतर परीक्षा माना गया है, जिसमें हर कदम पर नया साहस और धैर्य चाहिए। भाव है—आशा के साथ आगे बढ़ते रहो, मंज़िल अभी बाकी है।

अल्लामा इक़बाल

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

कि लगाए लगे और बुझाए बने

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में इश्क़ को ऐसी आग बताया गया है जो इंसान की मरज़ी से नहीं चलती। आप इसे अपने हिसाब से जगा सकते हैं, जगे हुए इश्क़ को आसानी से बुझा सकते हैं। भाव यह है कि प्यार भीतर से जलाता है और आदमी को बेबस कर देता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में इश्क़ को ऐसी आग बताया गया है जो इंसान की मरज़ी से नहीं चलती। आप इसे अपने हिसाब से जगा सकते हैं, जगे हुए इश्क़ को आसानी से बुझा सकते हैं। भाव यह है कि प्यार भीतर से जलाता है और आदमी को बेबस कर देता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

अकबर इलाहाबादी

कोई समझे तो एक बात कहूँ

इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।

फ़िराक़ गोरखपुरी

मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखा

उस को छुट्टी मिले जिस को सबक़ याद रहे

मीर ताहिर अली रिज़वी

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या

आगे आगे देखिए होता है क्या

Interpretation: Rekhta AI

मीर तक़ी मीर प्रेम को एक लंबी और कठिन यात्रा मानते हैं, जहाँ शुरुआत में ही रो पड़ना जल्दबाज़ी है। वक्ता धैर्य रखने को कहता है और संकेत देता है कि आगे और बड़ी कसौटियाँ सकती हैं। भाव यह है कि प्रेम का असली दर्द और सच आगे बढ़ने पर ही खुलता है।

Interpretation: Rekhta AI

मीर तक़ी मीर प्रेम को एक लंबी और कठिन यात्रा मानते हैं, जहाँ शुरुआत में ही रो पड़ना जल्दबाज़ी है। वक्ता धैर्य रखने को कहता है और संकेत देता है कि आगे और बड़ी कसौटियाँ सकती हैं। भाव यह है कि प्रेम का असली दर्द और सच आगे बढ़ने पर ही खुलता है।

मीर तक़ी मीर

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम

अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में प्रेम की शुरुआत का उग्र जोश और अंत की थकान दिखती है। “आग” जुनून, बेचैनी और अपने-आप को जलाने वाली लगन का रूपक है, और “राख” उस जलन के बाद बची हुई खालीपन और टूटन को। भाव यह है कि प्रेम का अंत कभी-कभी मिलन नहीं, बल्कि खुद का मिट जाना होता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में प्रेम की शुरुआत का उग्र जोश और अंत की थकान दिखती है। “आग” जुनून, बेचैनी और अपने-आप को जलाने वाली लगन का रूपक है, और “राख” उस जलन के बाद बची हुई खालीपन और टूटन को। भाव यह है कि प्रेम का अंत कभी-कभी मिलन नहीं, बल्कि खुद का मिट जाना होता है।

मीर तक़ी मीर

इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है

कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ इश्क़ को भारी पत्थर मानकर उसकी कठिनाई दिखाई गई है। कवि अपने-आप से या किसी कमज़ोर आशिक़ से कहता है कि प्रेम का भार उठाना साधारण बात नहीं। भाव यह है कि इश्क़ बड़ा और कठोर है, जबकि इंसान की ताक़त सीमित है, इसलिए भीतर बेबसी और दर्द है।

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ इश्क़ को भारी पत्थर मानकर उसकी कठिनाई दिखाई गई है। कवि अपने-आप से या किसी कमज़ोर आशिक़ से कहता है कि प्रेम का भार उठाना साधारण बात नहीं। भाव यह है कि इश्क़ बड़ा और कठोर है, जबकि इंसान की ताक़त सीमित है, इसलिए भीतर बेबसी और दर्द है।

मीर तक़ी मीर

इश्क़ जब तक कर चुके रुस्वा

आदमी काम का नहीं होता

जिगर मुरादाबादी

जज़्बा-ए-इश्क़ सलामत है तो इंशा-अल्लाह

कच्चे धागे से चले आएँगे सरकार बंधे

इंशा अल्लाह ख़ान इंशा

सख़्त काफ़िर था जिन ने पहले 'मीर'

मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्रेम को “मज़हब” यानी एक राह की तरह दिखाया गया है जो जिद और इनकार को भी बदल देता है। विरोधाभास यह है कि जो सबसे कड़े विरोधी थे, वही पहले झुक गए। मतलब यह कि प्रेम की ताकत बाहरी मान्यताओं से बड़ी है और दिल को नई आस्था दे देती है। भाव में हैरानी और भरोसा दोनों हैं।

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्रेम को “मज़हब” यानी एक राह की तरह दिखाया गया है जो जिद और इनकार को भी बदल देता है। विरोधाभास यह है कि जो सबसे कड़े विरोधी थे, वही पहले झुक गए। मतलब यह कि प्रेम की ताकत बाहरी मान्यताओं से बड़ी है और दिल को नई आस्था दे देती है। भाव में हैरानी और भरोसा दोनों हैं।

मीर तक़ी मीर

इश्क़ है इश्क़ ये मज़ाक़ नहीं

चंद लम्हों में फ़ैसला करो

सुदर्शन फ़ाकिर

जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे

उसे ज़िंदगी क्यूँ भारी लगे

वली दकनी

कुछ खेल नहीं है इश्क़ करना

ये ज़िंदगी भर का रत-जगा है

अहमद नदीम क़ासमी

इश्क़ में भी कोई अंजाम हुआ करता है

इश्क़ में याद है आग़ाज़ ही आग़ाज़ मुझे

ज़िया जालंधरी

कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया

जिस को ख़ाना-ख़राब होना था

जिगर मुरादाबादी
बोलिए