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हज़ार दास्तान-ए-इश्क़ पर शेर

हज़ार दास्तान-ए-इश्क़

से चयनित शे'र - संजीव सराफ़ द्वारा संकलित और अनूदित ख़ूबसूरत उर्दू अशआर का संकलन सलीस अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

कि लगाए लगे और बुझाए बने

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में इश्क़ को ऐसी आग बताया गया है जो इंसान की मरज़ी से नहीं चलती। आप इसे अपने हिसाब से जगा सकते हैं, जगे हुए इश्क़ को आसानी से बुझा सकते हैं। भाव यह है कि प्यार भीतर से जलाता है और आदमी को बेबस कर देता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम

मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो

तुम को देखें कि तुम से बात करें

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर पास बैठे प्रिय की मौजूदगी में पैदा हुई मीठी झिझक को दिखाता है। देखने का सुख इतना गहरा है कि बोलने की हिम्मत रुक-रुक जाती है। मन में चाह भी है कि बात हो, और डर भी कि बोलते ही वह नाज़ुक सा पल टूट जाए। इसी दुविधा में प्रेम की तीव्रता झलकती है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा

गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तू ख़ुदा है मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा

दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

अहमद फ़राज़

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है

ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ दिल को एक नगर मानकर कहा गया है कि दुख और चोटें बार-बार उसे लूटती रही हैं। इतने नुकसान के बाद उजाड़पन का ज़िक्र भी बेकार लगता है, क्योंकि टूटना जैसे रोज़ की बात बन गया है। “सौ बार” का अतिशयोक्ति वाला प्रयोग लगातार दुख और मन की थकान को दिखाता है।

मीर तक़ी मीर

उस ने अपना बना के छोड़ दिया

क्या असीरी है क्या रिहाई है

जिगर मुरादाबादी

इश्क़ माशूक़ इश्क़ आशिक़ है

यानी अपना ही मुब्तला है इश्क़

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में इश्क़ को एक ऐसी शक्ति बताया गया है जो खुद ही प्रेमी भी बनती है और प्रिय भी। इसलिए तड़प का कारण कोई बाहर का व्यक्ति नहीं, इश्क़ की अपनी प्रकृति है। भाव यह है कि इश्क़ अपना ही दर्द खुद पैदा करता है और उसी में डूबा रहता है।

मीर तक़ी मीर

क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर बे-ख़बर

क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम

नज़ीर अकबराबादी

परस्तिश की याँ तक कि बुत तुझे

नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय को “बुत” कहकर बताता है कि उसका प्रेम इतना गहरा था कि वह भक्ति जैसा बन गया। उसी लगातार पूजा और प्रशंसा के कारण लोगों की नजर में प्रिय का दर्जा भगवान जैसा हो गया। “सबकी नज़र” समाज की राय और नाम की ओर संकेत है। भाव यह है कि प्रेम ने प्रिय को इंसान से ऊपर बैठा दिया।

मीर तक़ी मीर

इश्क़ में मौत का नाम है ज़िंदगी

जिस को जीना हो मरना गवारा करे

कलीम आजिज़

तड़पती देखता हूँ जब कोई शय

उठा लेता हूँ अपना दिल समझ कर

मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम

सौ बार बंद-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए

पर क्या करें कि दिल ही अदू है फ़राग़ का

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में प्रेम को बंधन की तरह बताया गया है, जिससे वक्ता बार-बार छूटने की कोशिश करता है। लेकिन असली रुकावट बाहर नहीं, भीतर है—दिल खुद आराम और चैन से भिड़ता रहता है। इसलिए आज़ादी मिलकर भी टिकती नहीं और बेचैनी वापस खींच लेती है। भाव में भीतर का संघर्ष और बेबसी प्रमुख है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ना-कामी-ए-इश्क़ या कामयाबी

दोनों का हासिल ख़ाना-ख़राबी

हफ़ीज़ जालंधरी

बातें नासेह की सुनीं यार के नज़्ज़ारे किए

आँखें जन्नत में रहीं कान जहन्नम में रहे

अमीर मीनाई

काबे से ग़रज़ उस को बुत-ख़ाने से मतलब

आशिक़ जो तिरा है इधर का उधर का

शाह नसीर

बस मोहब्बत बस मोहब्बत बस मोहब्बत जान-ए-मन

बाक़ी सब जज़्बात का इज़हार कम कर दीजिए

फ़रहत एहसास

हो गया ज़र्द पड़ी जिस पे हसीनों की नज़र

ये अजब गुल हैं कि तासीर-ए-ख़िज़ाँ रखते हैं

इमाम बख़्श नासिख़

ता-फ़लक ले गई बेताबी-ए-दिल तब बोले

हज़रत-ए-इश्क़ कि पहला है ये ज़ीना अपना

जुरअत क़लंदर बख़्श

ख़्वाह दिल से मुझे चाहे वो

ज़ाहिरी वज़्अ' तो निबाहे वो

अनवर शऊर
बोलिए