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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

1911 - 1984 | लाहौर, पाकिस्तान

सबसे प्रख्यात एवं प्रसिद्ध शायर। अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई साल कारावास में रहे

सबसे प्रख्यात एवं प्रसिद्ध शायर। अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई साल कारावास में रहे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ग़ज़ल 89

नज़्म 150

अशआर 87

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब

आज तुम याद बे-हिसाब आए

और क्या देखने को बाक़ी है

आप से दिल लगा के देख लिया

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

क़ितआ 37

क़िस्सा 3

 

लेख 3

 

लोरी 1

 

पुस्तकें 129

चित्र शायरी 54

वीडियो 349

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ऑडियो 95

अब जो कोई पूछे भी तो उस से क्या शरह-ए-हालात करें

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

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स्कॉलर 5

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और क्लासिकी अलामात (प्रतीकों) का नया रूप: एक तनक़ीदी मुग़ालता (भ्रम)

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के मुताबिक़, फ़ैज़ की महानता सिर्फ़ क्लासिकी अल्फ़ाज़ को नए सियासी मानी पहनाने में नहीं छिपी है, बल्कि यह दावा उनकी शायरी की समझ को महदूद (सीमित) करता है।

क्या फ़ैज़ की शायरी वक़्त के साथ पुरानी हो जाएगी?

यह लेख इस सवाल का जवाब देता है कि क्या फ़ैज़ की सियासी शायरी वक़्त गुज़रने के साथ अपनी अहमियत खो देगी, और यह साफ़ करता है कि उनका सौंदर्यबोध (जमालियाती रचाव) उन्हें अमर बनाता है।

फ़ैज़ की शायरी में दर्द, याद और इंतिज़ार की रचनात्मक कसक

यह लेख फ़ैज़ की शायरी में 'दर्द', 'याद' और 'इंतिज़ार' के विषयों पर रोशनी डालता है, जो महज़ निजी ग़म नहीं बल्कि एक महान रचनात्मक और वैश्विक ताक़त के रूप में उभरते हैं।

 

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