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ग़ज़ल
तिलिस्म-ए-शम्स-ओ-नुजूम-ओ-क़मर से गुज़रे हैं
दयार-ए-हुस्न की हर रहगुज़र से गुज़रे हैं
नईम हामिद अली
ग़ज़ल
कभी महर-ओ-माह-ओ-नुजूम से कभी कहकशाँ से गुज़र गया
मैं तिरी तलाश में आख़िरश हद-ए-ला-मकाँ से गुज़र गया
मोहम्मद अमीर आज़म क़ुरैशी
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नज़्म
खिलौने
न काम आए मौजों के मोती जवाहिर की ज्योति न ख़ुशबू न राग
मुक़द्दर में पैहम नुजूम-ए-शब-ए-ग़म
यूसुफ़ ज़फ़र
ग़ज़ल
निशान-ए-ज़ख़्म पे निश्तर-ज़नी जो होने लगी
लहू में ज़ुल्मत-ए-शब उँगलियाँ भिगोने लगी
बद्र-ए-आलम ख़लिश
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
चराग़ राह में उस के अमल से जलने लगे
लो आज सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार आ ही गई



