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ग़ज़ल
अज्ञात
ग़ज़ल
फ़क़ीर-ए-राह को बख़्शे गए असरार-ए-सुल्तानी
बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साक़ी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सरिश्क रंग न बख़्शे तो क्यूँ हो बार-ए-मिज़ा
लहू हिना नहीं बनता तो क्यूँ बदन में रहे
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
ख़ुदा वो दर्द-ए-मोहब्बत हर एक को बख़्शे
कि जिस में रूह की तस्कीन भी पाई जाती है
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
ख़याल-ए-मर्ग कब तस्कीं दिल-ए-आज़ुर्दा को बख़्शे
मिरे दाम-ए-तमन्ना में है इक सैद-ए-ज़बूँ वो भी
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
तेरे बख़्शे हुए इक ग़म का करिश्मा है कि अब
जो भी ग़म हो मिरे मेयार से कम होता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
रग-ए-लैला को ख़ाक-ए-दश्त-ए-मजनूँ रेशगी बख़्शे
अगर बोवे बजा-ए-दाना दहक़ाँ नोक निश्तर की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हमारी सादा-लौही थी ख़ुदा-बख़्शे कि ख़ुश-फ़हमी
कि हर इंसान की सूरत को मा-फ़ौक़-उल-बशर जाना
गुलज़ार देहलवी
ग़ज़ल
तिरे बख़्शे हुए रंगों से है पुर-नूर हर मंज़र
यक़ीनन बहर ओ बर की रूह में शामिल है तू ही तू