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ग़ज़ल
उस के लहजे में दराड़ आती है और मैं उसी वक़्त
ख़्वाब रख देता हूँ ख़दशात उठा लेता हूँ
अहमद कामरान
ग़ज़ल
कहीं खिड़कियों की तरफ़ बंधी मिरी टिकटिकी तो ऐ लो अभी
गुल-ए-नर्गिस आ के लगा गई वो परी हर एक दराड़ में