aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "rat"
सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों सेसो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं
मौत का एक दिन मुअ'य्यन हैनींद क्यूँ रात भर नहीं आती
बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद कीचाँद भी 'ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी
उस से कहियो कि दिल की गलियों मेंरात दिन तेरी इंतिज़ारी है
कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थीकभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद हैहम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छाइस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिराकुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा
भीगी है रात 'फ़ैज़' ग़ज़ल इब्तिदा करोवक़्त-ए-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है
तेज़ हवा ने मुझ से पूछारेत पे क्या लिखते रहते हो
सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरतरात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला
जब रात गए कोई किरन मेरे बराबरचुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो
''आप की याद आती रही रात भर''चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर
रात भर पिछली सी आहट कान में आती रहीझाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था
आते आते मिरा नाम सा रह गयाउस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया
तुम तो यारो अभी से उठ बैठेशहर में रात जागती है अभी
जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिनबैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए
सोचता हूँ कि उस की याद आख़िरअब किसे रात भर जगाती है
अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँमैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे
अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँदया'नी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया
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