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नज़्म
देख मिरी जाँ कह गए बाहू कौन दिलों की जाने 'हू'
बस्ती बस्ती सहरा सहरा लाखों करें दिवाने 'हू'
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जब बरखा की रुत आती है जब काली घटाएँ उठती हैं
जिस वक़्त कि रिंदों के दिल से हू-हक़ की सदाएँ उठती हैं