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नज़्म
ख़ून-ए-दिल देना पड़ा ख़ून-ए-जिगर देना पड़ा
अपने ख़्वाबों की हसीं परछाइयाँ देना पड़ीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
याद आता ही नहीं मुझ को मिरा ज़ख़्म-ए-जिगर
सोचता हूँ कि ये निकहत है तो फिर ग़म क्या है
सलाम मछली शहरी
नज़्म
दाग़-ए-गुल-ओ-ग़ुंचा के बदले महकी हुई ख़ुश्बू लेंगे
मिली ख़लिश पर ज़ख़्म-ए-जिगर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
बर्क़ की तेग़ है सितम सीना फ़िगार क्यों न हो
ज़ख़्म-ए-जिगर हरे हुए याद-ए-बहार क्यों न हो
साक़िब कानपुरी
नज़्म
इश्क़ ही ज़िंदा ओ पाइंदा हक़ीक़त है 'जिगर'
इश्क़ को आम बना ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा कर
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
तलाश-ए-हुस्न-ओ-मुदावा-ए-ज़ख़्म-ए-दिल के लिए
चुरा के लाए हैं दो-चार लम्हे दुनिया से
माहिर मरनसूर
नज़्म
अगर है चूकना मंज़ूर क़ुराँ की तिलावत से
बरा-ए-ज़ख़्म-ए-ग़फ़लत मरहम-ए-ज़ंगार पैदा कर
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
फिर इत्तिसाल-ए-गर्दन-ओ-ख़ंजर है क्या कहूँ
फिर इख़्तिलात-ए-ज़ख़्म-ओ-नमक-दाँ है क्या करूँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ
नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा