aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "chamakne"
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरीज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए!हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!हो मिरे दम से यूँही मेरे वतन की ज़ीनतजिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
रुकी रुकी सी सफ़ें मल्गजी घटाओं कीउतार पर है सर-ए-सहन रक़्स पीपल कावो कुछ नहीं है अब इक जुम्बिश-ए-ख़फ़ी के सिवाख़ुद अपनी कैफ़ियत-ए-नील-गूँ में हर लहज़ाये शाम डूबती जाती है छुपती जाती हैहिजाब-ए-वक़्त सिरे से है बेहिस-ओ-हरकतरुकी रुकी दिल-ए-फ़ितरत की धड़कनें यक-लख़्तये रंग-ए-शाम कि गर्दिश ही आसमाँ में नहींबस एक वक़्फ़ा-ए-तारीक, लम्हा-ए-शहलासमा में जुम्बिश-ए-मुबहम सी कुछ हुई फ़ौरनतुली घटा के तले भीगे भीगे पत्तों सेहरी हरी कई चिंगारियाँ सी फूट पड़ींकि जैसे खुलती झपकती हों बे-शुमार आँखेंअजब ये आँख-मिचोली थी नूर-ओ-ज़ुल्मत कीसुहानी नर्म लवें देते अन-गिनत जुगनूघनी सियाह ख़ुनुक पत्तियों के झुरमुट सेमिसाल-ए-चादर-ए-शब-ताब जगमगाने लगेकि थरथराते हुए आँसुओं से साग़र-ए-शामछलक छलक पड़े जैसे बग़ैर सान गुमानबुतून-ए-शाम में इन ज़िंदा क़ुमक़ुमों की दमककिसी की सोई हुई याद को जगाती थीवो बे-पनाह घटा वो भरी भरी बरसातवो सीन देख के आँखें मिरी भर आती थींमिरी हयात ने देखी हैं बीस बरसातेंमिरे जनम ही के दिन मर गई थी माँ मेरीवो माँ कि शक्ल भी जिस माँ की मैं न देख सकाजो आँख भर के मुझे देख भी सकी न वो माँमैं वो पिसर हूँ जो समझा नहीं कि माँ क्या हैमुझे खिलाइयों और दाइयों ने पाला थावो मुझ से कहती थीं जब घिर के आती थी बरसातजब आसमान में हर सू घटाएँ छाती थींब-वक़्त-ए-शाम जब उड़ते थे हर तरफ़ जुगनूदिए दिखाते हैं ये भूली-भटकी रूहों कोमज़ा भी आता था मुझ को कुछ उन की बातों मेंमैं उन की बातों में रह रह के खो भी जाता थापर इस के साथ ही दिल में कसक सी होती थीकभी कभी ये कसक हूक बन के उठती थीयतीम दिल को मिरे ये ख़याल होता था!ये शाम मुझ को बना देती काश इक जुगनूतो माँ की भटकी हुई रूह को दिखाता राहकहाँ कहाँ वो बिचारी भटक रही होगीकहाँ कहाँ मिरी ख़ातिर भटक रही होगीये सोच कर मिरी हालत अजीब हो जातीपलक की ओट में जुगनू चमकने लगते थेकभी कभी तो मिरी हिचकियाँ सी बंध जातींकि माँ के पास किसी तरह मैं पहुँच जाऊँऔर उस को राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँदिखाऊँ अपने खिलौने दिखाऊँ अपनी किताबकहूँ कि पढ़ के सुना तो मिरी किताब मुझेफिर इस के ब'अद दिखाऊँ उसे मैं वो कापीकि टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनी थीं कुछ जिस मेंये हर्फ़ थे जिन्हें मैं ने लिक्खा था पहले-पहलऔर उस को राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँदिखाऊँ फिर उसे आँगन में वो गुलाब की बेलसुना है जिस को उसी ने कभी लगाया थाये जब कि बात है जब मेरी उम्र ही क्या थीनज़र से गुज़री थीं कल चार पाँच बरसातें
ये चाँदनी में धुले पाँव जब भी रक़्स करेंफ़ज़ा में अन-गिने घुँगरू छनकने लगते हैंये पाँव जब किसी रस्ते में रंग बरसाएँतो मौसमों के मुक़द्दर चमकने लगते हैं
ये कौन मुस्कुराहटों का कारवाँ लिए हुएशबाब-ए-शेर-ओ-रंग-ओ-नूर का धुआँ लिए हुएधुआँ कि बर्क़-ए-हुस्न का महकता शोला है कोईचटीली ज़िंदगी की शादमानियाँ लिए हुएलबों से पंखुड़ी गुलाब की हयात माँगे हैकँवल सी आँख सौ निगाह-ए-मेहरबाँ लिए हुएक़दम क़दम पे दे उठी है लौ ज़मीन-ए-रह-गुज़रअदा अदा में बे-शुमार बिजलियाँ लिए हुएनिकलते बैठते दिनों की आहटें निगाह मेंरसीले होंट फ़स्ल-ए-गुल की दास्ताँ लिए हुएख़ुतूत-ए-रुख में जल्वा-गर वफ़ा के नक़्श सर-ब-सरदिल-ए-ग़नी में कुल हिसाब-ए-दोस्ताँ लिए हुएवो मुस्कुराती आँखें जिन में रक़्स करती है बहारशफ़क़ की गुल की बिजलियों की शोख़ियाँ लिए हुएअदा-ए-हुस्न बर्क़-पाश शोला-ज़न नज़ारा-सोज़फ़ज़ा-ए-हुस्न ऊदी ऊदी बिजलियाँ लिए हुएजगाने वाले नग़मा-ए-सहर लबों पे मौजज़ननिगाहें नींद लाने वाली लोरियाँ लिए हुएवो नर्गिस-ए-सियाह-ए-नीम-बाज़, मय-कदा-ब-दोशहज़ार मस्त रातों की जवानियाँ लिए हुएतग़ाफ़ुल-ओ-ख़ुमार और बे-ख़ुदी की ओट मेंनिगाहें इक जहाँ की होशयारियाँ लिए हुएहरी-भरी रगों में वो चहकता बोलता लहूवो सोचता हुआ बदन ख़ुद इक जहाँ लिए हुएज़-फ़र्क़ ता-क़दम तमाम चेहरा जिस्म-ए-नाज़नींलतीफ़ जगमगाहटों का कारवाँ लिए हुएतबस्सुमश तकल्लुमे तकल्लुमश तरन्नुमेनफ़स नफ़स में थरथराता साज़-ए-जाँ लिए हुएजबीन-ए-नूर जिस पे पड़ रही है नर्म छूट सीख़ुद अपनी जगमगाहटों की कहकशाँ लिए हुए''सितारा-बार ओ मह-चकाँ ओ ख़ुर-फ़िशाँ'' जमाल-ए-यारजहान-ए-नूर कारवाँ-ब-कारवाँ लिए हुएवो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म शमीम-ए-मस्त से धुआँ धुआँवो रुख़ चमन चमन बहार-ए-जावेदाँ लिए हुएब-मस्ती-ए-जमाल-ए-काएनात, ख़्वाब-ए-काएनातब-गर्दिश-ए-निगाह दौर-ए-आसमाँ लिए हुएये कौन आ गया मिरे क़रीब उज़्व उज़्व मेंजवानियाँ, जवानियों की आँधियाँ लिए हुएये कौन आँख पड़ रही है मुझ पर इतने प्यार सेवो भूली सी वो याद सी कहानियाँ लिए हुएये किस की महकी महकी साँसें ताज़ा कर गईं दिमाग़शबों के राज़ नूर-ए-मह की नर्मियाँ लिए हुएये किन निगाहों ने मिरे गले में बाहें डाल दींजहान भर के दुख से दर्द से अमाँ लिए हुएनिगाह-ए-यार दे गई मुझे सुकून-ए-बे-कराँवो बे-कही वफ़ाओं की गवाहियाँ लिए हुएमुझे जगा रहा है मौत की ग़ुनूदगी से कौननिगाहों में सुहाग-रात का समाँ लिए हुएमिरी फ़सुर्दा और बुझी हुई जबीं को छू लियाये किस निगाह की किरन ने साज़-ए-जाँ लिए हुएसुते से चेहरे पर हयात रसमसाती मुस्कुरातीन जाने कब के आँसुओं की दास्ताँ लिए हुएतबस्सुम-ए-सहर है अस्पताल की उदास शामये कौन आ गया नशात-ए-बे-कराँ लिए हुएतिरे न आने तक अगरचे मेहरबाँ था इक जहाँमैं रो के रह गया हूँ सौ ग़म-ए-निहाँ लिए हुएज़मीन मुस्कुरा उठी ये शाम जगमगा उठीबहार लहलहा उठी शमीम-ए-जाँ लिए हुएफ़ज़ा-ए-अस्पताल है कि रंग-ओ-बू की करवटेंतिरे जमाल-ए-लाला-गूँ की दास्ताँ लिए हुए'फ़िराक़' आज पिछली रात क्यूँ न मर रहूँ कि अबहयात ऐसी शामें होगी फिर कहाँ लिए हुए(2)मगर नहीं कुछ और मस्लहत थी उस के आने मेंजमाल-ओ-दीद-ए-यार थे नया जहाँ लिए हुएइसी नए जहाँ में आदमी बनेंगे आदमीजबीं पे शाहकार-ए-दहर का निशाँ लिए हुएइसी नए जहाँ में आदमी बनेंगे देवतातहारतों का फ़र्क़-ए-पाक पर निशाँ लिए हुएख़ुदाई आदमी की होगी इस नए जहान परसितारों के हैं दिल ये पेश-गोईयाँ लिए हुएसुलगते दिल शरर-फ़िशाँ ओ शोला-बार बर्क़-पाशगुज़रते दिन हयात-ए-नौ की सुर्ख़ियाँ लिए हुएतमाम क़ौल और क़सम निगाह-ए-नाज़-ए-यार थीतुलू-ए-ज़िंदगी-ए-नौ की दास्ताँ लिए हुएनया जनम हुआ मिरा कि ज़िंदगी नई मिलीजियूँगा शाम-ए-दीद की निशानियाँ लिए हुएन देखा आँख उठा के अहद-ए-नौ के पर्दा-दारों नेगुज़र गया ज़माना याद-ए-रफ़्तगाँ लिए हुएहम इन्क़िलाबियों ने ये जहाँ बचा लिया मगरअभी है इक जहाँ वो बद-गुमानियाँ लिए हुए
रहमत का चमकने को है फिर नय्यर-ए-ताबाँहोने को है इस शब की सहर देख रहा हूँ
(1)कस तरह बयाँ हो तिरा पैराया-ए-तक़रीरगोया सर-ए-बातिल पे चमकने लगी शमशीरवो ज़ोर है इक लफ़्ज़ इधर नुत्क़ से निकलावाँ सीना-ए-अग़्यार में पैवस्त हुए तीरगर्मी भी है ठंडक भी रवानी भी सकूँ भीतासीर का क्या कहिए है तासीर ही तासीरएजाज़ उसी का है कि अर्बाब-ए-सितम कीअब तक कोई अंजाम को पहुँची नहीं तदबीरअतराफ़-ए-वतन में हुआ हक़ बात का शोहराहर एक जगह मक्र-ओ-रिया की हुई तश्हीररौशन हुए उम्मीद से रुख़ अहल-ए-वफ़ा केपेशानी-ए-आदा पे सियाही हुई तहरीर(2)हुर्रियत-ए-आदम की रह-ए-सख़्त के रह-गीरख़ातिर में नहीं लाते ख़याल-ए-दम-ए-ताज़ीरकुछ नंग नहीं रंज-ए-असीरी कि पुरानामर्दान-ए-सफ़ा-केश से है रिशता-ए-ज़ंजीरकब दबदबा-ए-जब्र से दबते हैं कि जिन केईमान ओ यक़ीं दिल में किए रहते हैं तनवीरमालूम है उन को कि रिहा होगी कसी दिनज़ालिम के गिराँ हाथ से मज़लूम की तक़दीरआख़िर को सर-अफ़राज़ हुआ करते हैं अहरारआख़िर को गिरा करती है हर जौर की तामीरहर दौर में सर होते हैं क़स्र-ए-जम-ओ-दाराहर अहद में दीवार-ए-सितम होती है तस्ख़ीरहर दौर में मलऊन शक़ावत है 'शिमर' कीहर अहद में मसऊद है क़ुर्बानी-ए-शब्बीर(2)करता है क़लम अपने लब ओ नुत्क़ की ततहीरपहुँची है सर-ए-हरफ़-ए-दुआ अब मिरी तहरीरहर काम में बरकत हो हर इक क़ौल में क़ुव्वतहर गाम पे हो मंज़िल-ए-मक़्सूद क़दम-गीरहर लहज़ा तिरा ताले-ए-इक़बाल सिवा होहर लहज़ा मदद-गार हो तदबीर की तक़दीरहर बात हो मक़्बूल, हर इक बोल हो बालाकुछ और भी रौनक़ में बढ़े शोल-ए-तक़रीरहर दिन हो तिरा लुत्फ़-ए-ज़बाँ और ज़ियादाअल्लाह करे ज़ोर-ए-बयाँ और ज़ियादा
उट्ठो अब माटी से उट्ठोजागो मेरे लालअब जागो मेरे लालतुमरी सेज जवान कारनदेखो आई रेन अँधयारननीले शाल दो-शाले ले करजिन में इन दुखियन अखियन नेढेर किए हैं इतने मोतीइतने मोती जिन की ज्योतिदान से तुमराजग जग लागानाम चमकनेउट्ठो अब माटी से उट्ठोजागो मेरे लालअब जागो मेरे लालघर घर बिखरा भोर का कुंदनघोर-अँधेरा अपना आँगनजाने कब से राह तके हैंबाली दुल्हनिया, बाँके वीरनसूना तुमरा राज पड़ा हैदेखो कितना काज पड़ा हैबैरी बिराजे राज-सिंघासनतुम माटी में लालउट्ठो अब माटी से उट्ठो, जागो मेरे लालहट न करो माटी से उट्ठो, जागो मेरे लालअब जागो मेरे लाल
इसी रफ़्तार से चलता है जहान-ए-गुज़राँइन्ही क़दमों पे ज़माने के क़दम उठते हैंकोई ऐनक से दिखाता है तो हम देखते हैंकोई काँधों पे उठाता है तो हम उठते हैंएक रक़्क़ासा-ए-तन्नाज़ की महफ़िल है जहाँकभी आते हैं भतीजे कभी अम उठते हैंकभी इक गोशा-ए-तारीक के वीराने मेंकिसी जुगनू के चमकने पे फ़ुग़ाँ होती हैकभी इस मर्हमत-ए-ख़ास का अंदाज़ा नहींकभी दो बूँद छलकने पे फ़ुग़ाँ होती हैकभी मंज़िल के तसव्वुर से जिगर जलते हैंकभी सहरा में भटकने पे फ़ुग़ाँ होती है
इक पर्दा काली मख़मल का आँखों पर छाने लगता हैइक भँवर हज़ारों शक्लों का दिल को दहलाने लगता हैइक तेज़ हिनाई ख़ुश्बू से हर साँस चमकने लगता हैइक फूल तिलिस्मी रंगों का गलियों में दमकने लगता हैसाँपों से भरे इक जंगल की आवाज़ सुनाई देती हैहर ईंट मकानों के छज्जों की ख़ून दिखाई देती है
सुनाऊँ तुम्हें बात इक रात कीकि वो रात अँधेरी थी बरसात कीचमकने से जुगनू के था इक समाँहवा पर उड़ीं जैसे चिंगारियाँपड़ी एक बच्चे की उन पे नज़रपकड़ ही लिया एक को दौड़ करचमकदार कीड़ा जो भाया उसेतो टोपी में झट-पट छुपाया उसेवो झम झम चमकता इधर से उधरफिरा कोई रस्ता न पाया मगरतो ग़मगीन क़ैदी ने की इल्तिजाजुगनूऐ छोटे शिकारी मुझे कर रिहाख़ुदा के लिए तू मुझे छोड़ देमेरी क़ैद के जाल को तोड़ देबच्चाकरूँगा न आज़ाद उस वक़्त तककि मैं देख लूँ दिन में तेरी चमकजुगनूचमक मेरी दिन में न देखोगे तुमउजाले में हो जाएगी वो तो गुमबच्चाअरे छोटे कीड़े न दे दम मुझेकि है वाक़फ़िय्यत अभी कम तुझेउजाले में दिन के खुलेगा कमालकि इतने से कीड़े में क्या है कमालधुआँ है न शो'ला न गर्मी न आँचचमकने की तेरे करूँगा मैं जाँचजुगनूये क़ुदरत की कारीगरी है जनाबकि ज़र्रा को चमकाए जूँ आफ़्ताबमुझे दी है इस वास्ते ये चमककि तुम देख कर मुझ को जाओ ठिठकन अल्हड़-पने से करो पाएमालसँभल कर चलो आदमी की सी चाल
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगेकिस की आँखों के तरन्नुम को चुरा लाई हैकिस की आग़ोश की ठंडक पे डाका डाला हैकिस की बाँहों से तू शबनम को उठा लाई है
गुलों से भरने लगे एशिया के लाला-ज़ारवो देखो हो गए यूरोप के आसमाँ शफ़्फ़ाफ़बहुत चमकने लगा है हमारा सय्यारापरिंदे गाने लगे हैं हवाएँ हो गईं साफ़
देखते देखतेउस के चारों तरफ़सात रंगों का रेशम बिखरने लगाधीमे धीमे कई खिड़कियाँ सी खुलींफड़फड़ाती हुई फ़ाख़ताएँ उड़ींबदलियाँ छा गईंबिजलियों की लकीरें चमकने लगींसारी बंजर ज़मीनें हरी हो गईंनाचते नाचतेमोर की आँख सेपहला आँसू गिराख़ूबसूरत सजीले परों की धनकटूट कर टुकड़ा टुकड़ा बिखरने लगीफिर फ़ज़ाओं से जंगल बरसने लगादेखते देखते....
बन गई बाद-ए-सुमूम आह असर से तेरेइस चमन में जो कभी बाद-ए-सबा भी आई
करूँगा फ़तह कोई शाम तो मैं उतरूँगा उलझती साँस के कीकर से औरख़्वाबों से रफ़्त-ओ-बूद के उस पारअबद के हुस्न-ए-हरीरी के सफ़ेद से फूल अपनी पलकों पे चुन सकूँगा मैंमैं बन सकूँगा ख़ुद अपना लिबास ख़ुद अपना तार-ए-नफ़सन सुन सकूँगा कोई लफ़्ज़ कोई नज़्म और कोई आवाज़सुकूत-ए-ज़ात में लम्हों की चाप तक न आएगीचमकते होश-ओ-हवास थक चुकें तो सवाद-ए-शाम मेंसोए हुए शजर के तले पड़ाव डालते हैंपुरानी यादों के रंगीं परिंदे शजर से नीचे उतरते हैंउदास आँखों के पुराने घर में ख़याल-ओ-ख़्वाबका मल्बूस पहने आते हैंमैं नन्हे तिफ़्ल के मानिंद उन्हें पकड़ने खुली नीम उजलीवादियों में दौड़ता हूँकहीं पे पैर फिसलता है और धड़ाम से नीचे काली खाईयोंमें डूबता हूँआँख खुलती हैचहार-सम्त अँधेरा है अँधेरे में सपेदीकोई रंग कोई लिबास नहींकोई ख़ुशबू कोई बास नहींबड़ी ही देर तलक घूरते अँधेरे मेंरफ़्ता रफ़्ता घुले हैं सियाही मुझ में और मैंसियाही मेंअथाह नींद के साहिल पे सारी उम्र के दाग़तमाम नस्ल के सारे गुनाह धुलते हैंमगर हवास कहाँ छोड़ते हैं जिस्म के रोगसवेरे पहली किरन रौशनी की जैसे ही झिलमिलाती हैख़्वाबीदा आँख कुलबुलाती हैअथाह नींद के साहिल पे धूप फैलती हैदाग़ उजालों में फिर चमकने लगते हैंसारे गुनाह अँधेरी रूह के ताक़ों पेफिर चराग़ की मानिंद जलने लगते हैंन शाम फ़तह हुई और न सुब्ह फ़तह हुईरात फ़तह हुई और न बात फ़तह हुईवही हूँ मैं वही दिन रात और वही मन-ओ-तूवही ज़माना वही यादें और वही ख़्वाबनशा उतरने पे वही मख़्लूक़ और वही दुनियावहीं हैं मोटरें वही रास्ते वही शहर और वही गाँववही है बीवी वही बच्चे वही घर और वही छाँवकरूँगा फ़तह कोई शाम तो मैं उतरूँगातिरे किनारे (मेरे रू-ब-रू) कि जहाँन कोई सुब्ह न शाम और न कोई नींद न ख़्वाबन कोई रस्ता न मंज़िल न कोई घर है न घाट!
रोने की उम्र है न सिसकने की उम्र हैजाम-ए-नशात बन के छलकने की उम्र हैशबनम की बूँद पी के चटकने की उम्र हैगुलशन में फूल बन के महकने की उम्र हैसद-मर्हबा ये गुमरही-ए-शौक़ चश्म-ओ-दिलहाँ राह-ए-आरज़ू में भटकने की उम्र हैइक जुर्म है ख़याल-ओ-तसव्वुर गुनाह काये उम्र सिर्फ़ पी के बहकने की उम्र हैदीवाना बन के नज्द के सहरा में घूमिएलैला की जुस्तुजू में भटकने की उम्र हैबेचैन क्यूँ हो रूह किसी एक के लिएहर माह-वश पे जान छिड़कने की उम्र हैइस दौर-ए-इम्बिसात में ब-हालत-ए-जुनूँहर कू-ए-दिलबराँ में भटकने की उम्र हैलाज़िम नहीं कि ख़ुद को बचाता फिरूँ तमामशीशा हूँ चोट खा के दरकने की उम्र हैतस्कीं वो दे रही हैं पर ऐ क़ल्ब-ए-ना-सुबूरतू और भी धड़क कि धड़कने की उम्र हैजब चल पड़ा हूँ घर से तो मंज़िल की शर्त क्याहूँ रह-नवर्द-ए-शौक़ भटकने की उम्र हैहूँ आफ़्ताब-ए-ताज़ा हुआ हूँ अभी तुलू'अअपने जहान-ए-नौ में चमकने की उम्र हैऐवान ओ तख़्त-ओ-ताज हैं मेरी लपेट मेंशोला हूँ मैं ये मेरे भड़कने की उम्र है'दौराँ' मैं बज़्म-ए-दोस्त में छेड़ूँ न क्यूँ ग़ज़लये ज़मज़मे के दिन हैं लहकने की उम्र है
वो दिन भी आए हैं उस की सियाह ज़ुल्फ़ों मेंकपास खिलने लगी है, झलकती चाँदी केकशीदा तार चमकने लगे हैं बालों मेंवो दिन भी आए हैं सुर्ख़ ओ सपीद गालों मेंधनक का खेलना ममनूअ है, लबों पे फ़क़तगुलों की ताज़गी इक साया-ए-गुरेज़ाँ हैवो भी दिन आए हैं उस के सबीह चेहरे परकहीं कहीं कोई सिलवट उभर सी आई हैज़रा सी मुज़्महिल थोड़ी थकी थकी सी नज़रतलाश करती है उम्र-ए-गुरेज़ पा के नुक़ूश
तुम्हें लाई है मेरे रू-ब-रूसाअ'त चमकने कीतुम्हारे साथ आई हैफ़ज़ा मेरे महकने कीहवा में फैलती जाती है ख़ुशबूफ़स्ल पकने कीमिरी तिमसाल में नक़्श-ए-नुमू कैसे उभरता हैउस आईने मेंअक्स-ए-ख़ूब-रू कैसे उभरता हैनया मौसम मिरे पत्तों में क्या क्या रंगभरता हैये मंज़र देखते रहनासितारेतुम झुके हो मेरी शाख़ों परझुके रहना
सर-ज़मीन-ए-तमन्ना की मिट्टी सलाख़ें उगाने लगी हैगिरफ़्तार होने का मौसमसर-ए-क़र्या-ए-आबरूआफ़्ताब-ए-हलाकत की सूरत चमकने लगा हैशुआ'ओं के नोकीले पंजों ने जिस्मों को ज़ख़्मी किया हैभँवर दर भँवर रौशनी के समुंदरतूफ़ान क़ैदी हुएये बस्ती गुनाहों से मा'मूर आफ़त-रसीदों की बस्ती हैनौ-ज़ाइदा आरज़ू इंतिहाओं के इम्काँ समेटेज़मीरों में लुथड़ी जराएम-ज़दा ख़्वाहिशों कोमिटाए तो कैसेरगों के दरीचों से लिपटी फ़सीलों को रेज़ों की सूरतहवा में उछाले तो कैसेकि उस का नविश्ता फ़क़त अज़-सर-ए-नौ गिरफ़्तार होनाने दाएरों के तसल्लुत में जीनासियाही के बातिन में मौजूद ग़ारों में रहनाहलाकत की सर-चश्मा-गाहों सेआज़ाद रहने की अज़्मत से वाक़िफ़ हवाओहमारी फ़सीलों की जानिब भी आओहमें ये बताओगिरफ़्तार होना हमारा नविश्ता नहीं थाइरादों में मौजूद तौक़-ओ-सलासिलहवसनाक दहशततमन्ना की मिट्टी में फ़ौलाद होते रहे हैंख़ुद अपनी तवाना हक़ीक़तगिरफ़्तार करने से क़ासिर रहे मैं
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