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नज़्म
मुझे तो इंतिज़ार-ए-इश्क़ में ही लुत्फ़ आता है
'अलीना' इंतिज़ार-ए-इश्क़ ग़ज़लों को सजा देगा
अलीना इतरत
नज़्म
हमारे शेरों में मक़्तल के इस्तिआरे हैं
हमारे ग़ज़लों ने देखा है कूचा-ए-क़ातिल
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
नज़्म
मकतब में रह कर लड्डन-ख़ाँ ग़ज़लें कहना सीख चुके थे
अफ़्ग़ानी होने के नाते लोगों से डरते भी नहीं थे
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
नज़्म
तिरी आवाज़ में ग़ज़लों का धीमा-पन महकता है
कोई सुर है कोई लय है तिरी साँसों में सरगम है
शाहबाज़ नय्यर
नज़्म
वो कभी लफ़्ज़ बन कर मेरी ग़ज़लों में सँवर जाता है
जब वो हँसता है हर सम्त जुगनू चमकने लगते हैं
सदफ़ मासूम
नज़्म
तिरे ही जिस्म का जादू जगा है नज़्मों में
ऐ मेरी जाँ मिरी ग़ज़लों की नग़्मगी सुन तो