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नज़्म
पढ़ के जिस के हो गईं हुश्यार अक़वाम-ए-ग़ुलाम
इश्तिराकी फ़ल्सफ़ा का खुल गया हर दिल में बाब
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
इब्न-ए-मरयम भी उठे मूसी-ए-इमराँ भी उठे
राम ओ गौतम भी उठे फ़िरऔन ओ हामाँ भी उठे
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बे-इल्म-ओ-बे-हुनर है जो दुनिया में कोई क़ौम
नेचर का इक़तिज़ा है रहे बन के वो ग़ुलाम
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
ज़िंदगी है तो कोई बात नहीं है ऐ दोस्त
ज़िंदगी है तो बदल जाएँगे ये लैल ओ नहार
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
رہيلہ کس قدر ظالم، جفا جو، کينہ پرور تھا
نکاليں شاہ تيموري کي آنکھيں نوک خنجر سے