aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "idu"
सो ये जवाब है मेरा मिरे अदू के लिएकि मुझ को हिर्स-ए-करम है न ख़ौफ़-ए-ख़म्याज़ाउसे है सतवत-ए-शमशीर पर घमंड बहुतउसे शिकोह-ए-क़लम का नहीं है अंदाज़ा
तुम्हें भी ज़िद है कि मश्क़-ए-सितम रहे जारीहमें भी नाज़ कि जौर-ओ-जफ़ा के आदी हैंतुम्हें भी ज़ोम महा-भारता लड़ी तुम नेहमें भी फ़ख़्र कि हम कर्बला के आदी हैं
ऐ देखने वालोइस हुस्न को देखोइस राज़ को समझोये नक़्श-ए-ख़यालीये फ़िक्रत-ए-आलीये पैकर-ए-तनवीरये कृष्ण की तस्वीरमअनी है कि सूरतसनअ'त है कि फ़ितरतज़ाहिर है कि मस्तूरनज़दीक है या दूरये नार है या नूरदुनिया से निरालाये बाँसुरी वालागोकुल का ग्वालाहै सेहर कि एजाज़खुलता ही नहीं राज़क्या शान है वल्लाहक्या आन है वल्लाहहैरान हूँ क्या हैइक शान-ए-ख़ुदा हैबुत-ख़ाने के अंदरख़ुद हुस्न का बुत-गरबुत बन गया आ करवो तुर्फ़ा नज़्ज़ारेयाद आ गए सारेजमुना के किनारेसब्ज़े का लहकनाफूलों का महकनाघनघोर घटाएँसरमस्त हवाएँमासूम उमंगेंउल्फ़त की तरंगेंवो गोपियों के साथहाथों में दिए हाथरक़्साँ हुआ ब्रिजनाथबंसी में जो लय हैनश्शा है न मय हैकुछ और ही शय हैइक रूह है रक़्साँइक कैफ़ है लर्ज़ांएक अक़्ल है मय-नोशइक होश है मदहोशइक ख़ंदा है सय्यालइक गिर्या है ख़ुश-हालइक इश्क़ है मग़रूरइक हुस्न है मजबूरइक सेहर है मसहूरदरबार में तन्हालाचार है कृष्णाआ श्याम इधर आसब अहल-ए-ख़ुसूमतहैं दर पए इज़्ज़तये राज दुलारेबुज़दिल हुए सारेपर्दा न हो ताराजबेकस की रहे लाजआ जा मेरे कालेभारत के उजालेदामन में छुपा लेवो हो गई अन-बनवो गर्म हुआ रनग़ालिब है दुर्योधनवो आ गए जगदीशवो मिट गई तशवीशअर्जुन को बुलायाउपदेश सुनायाग़म-ज़ाद का ग़म क्याउस्ताद का ग़म क्यालो हो गई तदबीरलो बन गई तक़दीरलो चल गई शमशीरसीरत है अदू-सोज़सूरत नज़र-अफ़रोज़दिल कैफ़ियत-अंदोज़ग़ुस्से में जो आ जाएबिजली ही गिरा जाएऔर लुत्फ़ पर आएतो घर भी लुटा जाएपरियों में है गुलफ़ामराधा के लिए श्यामबलराम का भय्यामथुरा का बसय्याबिंद्रा में कन्हैय्याबन हो गए वीराँबर्बाद गुलिस्ताँसखियाँ हैं परेशाँजमुना का किनारासुनसान है सारातूफ़ान हैं ख़ामोशमौजों में नहीं जोशलौ तुझ से लगी हैहसरत ही यही हैऐ हिन्द के राजाइक बार फिर आ जादुख दर्द मिटा जाअब्र और हवा सेबुलबुल की सदा सेफूलों की ज़िया सेजादू-असरी गुमशोरीदा-सरी गुमहाँ तेरी जुदाईमथुरा को न भाईतू आए तो शान आएतू आए तो जान आएआना न अकेलेहों साथ वो मेलेसखियों के झमेले
ऐ सिपहर-ए-बरीं के सय्यारोऐ फ़ज़ा-ए-ज़मीं के गुल-ज़ारोऐ पहाड़ों की दिल-फ़रेब फ़ज़ाऐ लब-ए-जू की ठंडी ठंडी हवाऐ अनादिल के नग़मा-ए-सहरीऐ शब-ए-माहताब तारों भरीऐ नसीम-ए-बहार के झोंकोदहर-ए-ना-पाएदार के धोकोतुम हर इक हाल में हो यूँ तो अज़ीज़थे वतन में मगर कुछ और ही चीज़जब वतन में हमारा था रमनातुम से दिल बाग़ बाग़ था अपनातुम मिरी दिल-लगी के सामाँ थेतुम मिरे दर्द-ए-दिल के दरमाँ थेतुम से कटता था रंज-ए-तन्हाईतुम से पाता था दिल शकेबाईआन इक इक तुम्हारी भाती थीजो अदा थी वो जी लुभाती थीकरते थे जब तुम अपनी ग़म-ख़्वारीधोई जाती थीं कुलफ़तें सारीजब हवा खाने बाग़ जाते थेहो के ख़ुश-हाल घर में आते थेबैठ जाते थे जब कभी लब-ए-आबधो के उठते थे दिल के दाग़ शिताबकोह ओ सहरा ओ आसमान ओ ज़मींसब मिरी दिल-लगी की शक्लें थींपर छुटा जिस से अपना मुल्क ओ दयारजी हुआ तुम से ख़ुद-ब-ख़ुद बेज़ारन गुलों की अदा ख़ुश आती हैन सदा बुलबुलों की भाती हैसैर-ए-गुलशन है जी का इक जंजालशब-ए-महताब जान को है वबालकोह ओ सहरा से ता लब-ए-दरियाजिस तरफ़ जाएँ जी नहीं लगताक्या हुए वो दिन और वो रातेंतुम में अगली सी अब नहीं बातेंहम ही ग़ुर्बत में हो गए कुछ औरया तुम्हारे बदल गए कुछ तौरगो वही हम हैं और वही दुनियापर नहीं हम को लुत्फ़ दुनिया काऐ वतन ऐ मिरे बहिश्त-ए-बरीँक्या हुए तेरे आसमान ओ ज़मींरात और दिन का वो समाँ न रहावो ज़मीं और वो आसमाँ न रहातेरी दूरी है मोरिद-ए-आलामतेरे छुटने से छुट गया आरामकाटे खाता है बाग़ बिन तेरेगुल हैं नज़रों में दाग़ बिन तेरेमिट गया नक़्श कामरानी कातुझ से था लुत्फ़ ज़िंदगानी काजो कि रहते हैं तुझ से दूर सदाइन को क्या होगा ज़िंदगी का मज़ाहो गया याँ तो दो ही दिन में ये हालतुझ बिन एक एक पल है इक इक सालसच बता तो सभी को भाता हैया कि मुझ से ही तेरा नाता हैमैं ही करता हूँ तुझ पे जान निसारया कि दुनिया है तेरी आशिक़-ए-ज़ारक्या ज़माने को तू अज़ीज़ नहींऐ वतन तू तो ऐसी चीज़ नहींजिन ओ इंसान की हयात है तूमुर्ग़ ओ माही की काएनात है तूहै नबातात का नुमू तुझ सेरूख तुझ बिन हरे नहीं होतेसब को होता है तुझ से नश्व-ओ-नुमासब को भाती है तेरी आब-ओ-हवातेरी इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदलेलूँ न हरगिज़ अगर बहिश्त मिलेजान जब तक न हो बदन से जुदाकोई दुश्मन न हो वतन से हवा
ऐ जहाँ देख ले कब से बे-घर हैं हमअब निकल आए हैं ले के अपना अलमये महल्लात ये ऊँचे ऊँचे मकाँइन की बुनियाद में है हमारा लहूकल जो मेहमान थे घर के मालिक बनेशाह भी है अदू शैख़ भी है अदूकब तलक हम सहें ग़ासिबों के सितमऐ जहाँ देख ले कब से बे-घर हैं हमअब निकल आए हैं ले के अपना अलम
ये वक़्त आए तो बे-इरादाकभी कभी मैं भी देखता हूँउतार कर ज़ात का लबादाकहीं सियाही मलामतों कीकहें पे गुल-बूटे उल्फ़तों केकहें लकीरें हैं आँसुओं कीकहें पे ख़ून-ए-जिगर के धब्बेये चाक है पंजा-ए-अदू काये मोहर है यार-ए-मेहरबाँ कीये लअ'ल लब-हा-ए-मह-विशाँ केये मर्हमत शैख़-ए-बद-ज़बाँ की
गिरी है बर्क़-ए-तपाँ दिल पे ये ख़बर सुन करचढ़ा दिया है भगत-सिंह को रात फाँसी परउठा है नाला-ए-पुर-दर्द से नया महशरजिगर पे मादर-ए-भारत के चल गए ख़ंजरशिकस्ता-हाल हुआ क़ौम के हबीबों काबदन में ख़ुश्क लहू हो गया ग़रीबों काअभी तो क़ौम ने 'नेहरू' का ग़म उठाया थाअभी तो दास की फ़ुर्क़त ने हश्र ढाया थाअभी तो हिज्र का बिस्मिल के ज़ख़्म खाया थाअभी तो कोह-ए-सितम चर्ख़ ने गिराया थाचले हैं नावक-ए-बेदाद फिर कलेजों परकि आज उठ गए अफ़्सोस नौजवाँ रहबरअदू वतन को तशद्दुद से क्या दबाएँगेवो अपने हाथ से फ़ित्ने नए जगाएँगेजो मुल्क-ओ-क़ौम की देवी पे सर चढ़ाएँगेनिसार हो के शहीदों में नाम पाएँगेगिरेगा क़तरा-ए-ख़ूँ भी जहाँ सपूतों काफ़िदा-ए-हिंद वहाँ होंगे सैंकड़ों पैदाजहाँ से मुल्क-ए-अदम नौनिहाल जाते हैंनुमायाँ कर के सितम-कश का हाल जाते हैंगिरा के हिन्द में कोह-ए-मलाल जाते हैंवतन को छोड़ के भारत के लाल जाते हैंतड़प रहे हैं जुदाई में बे-क़रार-ए-वतनचले हैं आलम-ए-बाला को जाँ-निसार-ए-वतन
भूल गई है आज तो रहबर-ए-हक़-निगाह कोभूल गई है आज तू मर्द-ए-जहाँ-पनाह कोभूल गई है आज तू ज़ब्त के बादशाह कोतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमतेरे महंत तो अभी मस्त हैं ज़ात-पात मेंतेरे बड़े बड़े गुरु ग़र्क़ हैं छूत-छात मेंआह कि ढूँढती है तू नूर अँधेरी रात मेंतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमआह कि तू ने ज़ब्त के दर्स को भी भुला दियाआह कि तू ने क़ल्ब से नाम-ए-सफ़ा मिटा दियाआह कि दोस्तों को भी तू ने अदू बना दियातुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमतेरे मुशीर बे-अमल तेरे वज़ीर बे-अमलतेरे ग़रीब बे-अमल तेरे अमीर बे-अमलतेरे सफ़ीर बे-अमल तेरे कबीर बे-अमलतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमउफ़ कि क़दम क़दम पे है तेरा शरीक अहरमनउफ़ कि तुझे नसीब हैं फिरका-परस्त राहज़नउफ़ कि तुझे अज़ीज़ हैं चर्ब-ज़बान-ओ-बद-सुख़नतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमउफ़ कि जहालतों पे भी अक़्ल का है गुमाँ तुझेउफ़ कि अभी पसंद है जहल की दास्ताँ तुझेउफ़ कि है फ़िरक़ा दोस्ती देती अभी अमाँ तुझेतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमज़ुल्म किए हैं तू ने जो ज़ुल्म के शाहिदों से पूछक़त्ल किए हैं किस क़दर अपने मुजाहिदों से पूछपीते हैं रोज़ कितनी मय झूट के ज़ाहिदों से पूछतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमदर्स-ए-महात्मा का भी तुझ पर कोई असर नहींक़ौल-ए-महात्मा पे भी आज तिरी नज़र नहींकौन है उस का जा-नशीं इस की तुझे ख़बर नहींतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमतुझ को बताए कौन आज अस्ल में राहबर है कौनतुझ को बताए कौन आज बंदा-ए-मो'तबर है कौनतुझ को बताए कौन आज पीर-ए-जवाँ-नज़र है कौनतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौमदेख न चश्म-ए-शौक़ से पत्थरों के तो तौर तूक़द्र-ए-जवाहर-ए-हसीं देख ब-चश्म-ए-ग़ौर तूवर्ना हज़ार ज़िल्लतें तेरे लिए हैं और तूतुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौमऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम ऐ मिरी ज़िंदाबाद क़ौम
इस क़ौम की फ़लाह है जाम-ओ-सुबू के बेचतुम इंतिख़ाब जा के लड़ो हाव-हू के बीचदुश्नाम और बलवों के और दू-ब-दू के बीचजैसे कि कोई बैठा हो बज़्म-ए-अदू के बीच''मस्ती से दरहमी है मिरी गुफ़्तुगू के बीच''''जो चाहो तुम भी मुझ को कहो मैं नशे में हूँ''
गिरा रहा है तिरा शौक़ शम्अ पर तुझ कोमुझे ये डर है न पहुँचे कहीं ज़रर तुझ कोफ़रोग़-ए-शोला कहाँ और फ़रोग़-ए-हुस्न कहाँहज़ार हैफ़ कि इतनी नहीं ख़बर तुझ कोतड़प तड़प के जो बे-इख़्तियार करता हैनहीं है आग के शोला से आह डर तुझ कोये नन्हे नन्हे पर ओ बाल ये सितम की तपिशमिला है आह क़यामत का क्या जिगर तुझ कोक़रीब शम्अ के आ कर जो थरथराता हैनहीं है जान के जाने का ग़म मगर तुझ कोमिलेगी ख़ाक भी ढूँडे न तेरी महफ़िल मेंसबा उड़ाए फिरेगी दम-ए-सहर तुझ कोसमझ न शम्अ को दिल सोज़ आफ़ियत दुश्मनजला के आह रहेगी ये मुश्त-ए-पर तुझ कोनहीं है तू अभी सोज़-ओ-गुदाज़ के क़ाबिलनहीं है इश्क़ की अर्ज़ ओ नियाज़ के क़ाबिलतपिश ये बज़्म में फ़ानूस पर नहीं अच्छीकि आग लाग की ओ बे-ख़बर नहीं अच्छीकड़ी है आँच मोहब्बत की शम-ए-महफ़िल सेलगावटें अरे तुफ़्ता-जिगर नहीं अच्छीतड़प तड़प के न दीवाना-वार शम्अ पे गिरतपिश ये शौक़ की, ओ मुश्त-ए-पर नहीं अच्छीये जाँ-गुदाज़ी-ए-सोज़-ए-वफ़ा सर-ए-महफ़िलकहीं न हो तिरे जी का ज़रर नहीं अच्छीलड़ा न शम्अ से आँखें कि है उदू तेरीतिरी निगाह-ए-मोहब्बत-असर नहीं अच्छीये नन्हे नन्हे परों की तड़प ये बेताबीहरीफ़-ए-शोख़ी-ए-बर्क़-ए-नज़र नहीं अच्छीये पर समेट के फ़ानूस पर तिरा गिरनाये बे-ख़ुदी अरे शोरीदा-सर नहीं अच्छीचमन में चल कि दिखाऊँ बहार-ए-शाहिद-ए-गुलनज़र फ़रेब हैं नक़्श-ओ-निगार-ए-शाहिद-गुलमैं बुल-हवस नहीं समझा है तू ने क्या मुझ कोपसंद शाहिद-ए-गुल की नहीं अदा मुझ कोफ़िराक़-ए-गुल में मैं मिन्न्त-कश-ए-फ़ुग़ाँ हूँ दरेग़ये दाग़-ए-सोज़-ए-जुदाई न दे ख़ुदा मुझ कोदिल-ए-गुदाख़्ता ले कर अज़ल से आया हूँबनाया बज़्म में है सोज़-आश्ना मुझ कोजले वो बज़्म में चुप-चाप और मैं न जलूँबईद इश्क़ से है हो ग़म-ए-फ़ना मुझ कोतिरी निगाह में जाँ-सोज़ है जो ऐ बुलबुलवो आह आग का शोला है जाँ-फ़ज़ा मुझ कोखुला है तुझ पे अभी आह राज़-ए-इश्क़ कहाँतू बुल-हवस है, तुझे इम्तियाज़-ए-इश्क़ कहाँ
ऐ नाज़िर-ए-बे-ख़बरअब तुम ना ही आओ तो अच्छा हैअब यहाँ फिर शुरूअ' से शुरूअ' कौन करेलम्हा लम्हा शब-ए-ग़म का यूँ अदू कौन करेहोंट सूखे हैं इन्हें फिर से कमाँ कौन करेदीद को चश्मा-ओ-शमशीर ज़बाँ कौन करे
फ़स्ल-ए-बहार आई मगर हम हैं और ग़महर सम्त से हैं घेरे हुए सदमा-ओ-अलमआई न उफ़ ज़बाँ पे सितम पर हुए सितमक्या इम्तिहाँ के वास्ते ठहरे हैं सिर्फ़ हमजब अपनी क़ुव्वतों पे भरोसा नहीं रहाबेहतर है फिर जहाँ से उठा ले हमें ख़ुदाइस उम्र-ए-चंद-रोज़ा में की लाख जुस्तुजूछानी है हम ने ख़ाक ज़माने में कू-ब-कूशिकवा अदू का क्या है जब अहबाब हैं अदूजीने की इक सेकेंड नहीं अब तो आरज़ूहम ने समझ लिया कि जहाँ से गुज़र गएजब दिल ही मर गया तो सब अरमान मर गएहम पर गिराएँ चर्ख़ ने इस हद पे बिजलियाँदम-भर में जल के ख़ाक हुईं सारी उस्तुख़्वाँचलती रहीं हवा-ए-मुख़ालिफ़ की आँधियाँआता नहीं समझ में कि जा कर छुपें कहाँज़ेर-ए-ज़मीं भी चैन की उम्मीद अब नहींफिर क्या है ये बता दे कोई गर ग़ज़ब नहींमक्र-ओ-फ़रेब से जो करें ज़िंदगी बसरसौ जाँ हज़ार दिल से हो क़ुर्बान हर बशरदिन रात हम हों और हों अहबाब-ए-ख़ीरा-सरईमान-दारीयों में कटी ज़िंदगी अगरहर एक की निगाह में बस ख़ार हो गएबे-सोंचे-समझे मुस्तहिक़-ए-दार हो गएदा'वा तो ये है हम भी मुसलमान हैं ज़रूरकलमा जो पोछिए तो नहीं याद है हुज़ूरक्या ग़म अगर शिकस्ता अज़ीज़ों के हैं क़ुबूरतेरा ये इस पे हद से ज़ियादा है कुछ ग़ुरूरमेलों के वास्ते जो तलब हो तो ख़ूब देंक़ौमी जो कोई काम हो तो नाम भी न लेंपूछा अगर इबादत-ए-ख़ालिक़ है कोई चीज़फ़रमाया दिल में ये तो निहायत है बद-तमीज़अय्याशियाँ जो कीजिए तो आप हैं अज़ीज़ऐ क़ौम काहिली है तिरी घर की अब कनीज़अच्छी बुरी का जब तो नहीं इम्तियाज़ हैबे-माएगी पर अपनी फ़क़त तुझ को नाज़ हैहुश्यार कोई लाख करे तो है बे-ख़बरइस दर्जा बे-हया कि नहीं दिल पे कुछ असरनाज़ाँ हैं सिर्फ़ बाप के दादा के नाम परक़र्ज़े में हो रही है मगर ज़िंदगी बसरदेखो तो ग़ैर हँसते हैं होश्यार हो ज़रालिल्लाह अब तो ख़्वाब से बेदार हो ज़राफूलो-फलो इलाही रहो शाद सर-ब-सरहो नख़्ल-ए-इत्तिहाद हमेशा ये बारवरवो दिन ख़ुदा दिखाए कि ले आए ये समरआना है तुम को मंज़िल-ए-मक़्सूद तक अगरडाली है इत्तिहाद की तुम ने जो दाग़-बेलहिम्मत न हारो जान के बच्चों का एक खेलदेखो तो और क़ौमों में क्या इत्तिहाद हैदौलत से और इल्म से हर एक शाद हैतुम में भी आज ऐसा कोई ख़ुश-निहाद हैमहमूद का ये क़ौल हमें अब तो याद हैदो दिन रहे जो आ के जहाँ में तो खल गएआख़िर को मिस्ल-ए-ख़ार-ए-चमन से निकल गएऐ सकिनान मौज़ा-ए-जुगवूर अस्सलामदुनिया है आज तुम को हर इक बात का पयामअब तो निकालो अपनी दिलों से ख़याल-ए-ख़ामअच्छा नहीं जो ग़ैर के बन जाओ तुम ग़ुलामअच्छी नसीहतों पे अमल फिर ज़रूर हैकोई न ये कहे कि सरासर क़ुसूर हैअपने उमूर में न करो ग़ैर को शरीकशर को न ढूँढो और करो ख़ैर को शरीकअच्छे नहीं सफ़र जो करें सैर को शरीकका'बे के ज़िक्र में न करो दैर को शरीकतुम ख़ुद रहे हो साहिब-ए-इक़बाल दहर मेंक्यूँ ढूँडते हो ज़ाइक़ा-ए-शहद ज़हर मेंअख़्लाक़ का चराग़ बुझाना न चाहिएज़ुल्मत-कदा में ग़ैर के जाना न चाहिएसच्ची नसीहतों को भुलाना न चाहिएतुम को किसी फ़रेब में आना न चाहिएअल्लाह के भरोसा पे हर काम तुम करोदुश्मन भी जिस को मान लें वो नाम तुम करो
शौक़ आज़ादी का मुझ को खींच लाया है यहाँआज दुश्मन है ज़मीं मेरी अदू है आसमाँ
हर एक बच्चा है एक बच्चा न है किसी का कभी अदू वोये भेद भाव ये फ़ासला सब ख़ुद अपना पैदा किया हुआ हैकिसी का मज़हब नहीं ये कहता कि तुम न जीने दो दूसरों कोख़ुदा तो सब का है एक लेकिन मक़ाम-ए-सज्दा जुदा जुदा है
जो अदू हैं वो हमारे ही अदू कब हैं फ़क़तहम हदफ़ कब हैं कि उन का हदफ़ आसानी हैउन को मा'लूम नहीं हम हैं कोई शौकत-ए-ज़ौइल्म का क़त्ल फ़क़त मज़हबी नादानी है
तेरी गुफ़्तुगू मेंएक जुस्तुजू हैजो मेरे रू-ब-रू हैमेरा हू-ब-हू हैमेरा मैंऔर तेरा मैंदर-अस्ल यही तोदोनों का अदू हैचलो इस मैं काफ़ासला मिटा देंमगरमैं की इस अना में क़ैदहमारे वजूद कोये फ़ैसलामंज़ूर कब है
बे-झिजक, बे-ख़तरबे-धड़क वार करमेरी गर्दन उड़ाऔर ख़ूँ से मिरे कामयाबी के अपनी नए जाम भरछीन ले हुस्न-ओ-ख़ूबी, अना, दिलकशीमेरे लफ़्ज़ों में लिपटा हुआ माल-ओ-ज़रमेरी पोरों से बहती हुई रौशनीमेरे माथे पे लिक्खे हुए सब हुनरतुझ से शिकवा नहींऐ अदू मेरे मैं तेरी हमदर्द हूँतेरी बे-चेहरगी मुझ को भाती नहींतुझ से कैसे कहूँ!!!तुझ से कैसे कहूँ! क़त्ल करना मुझे तेरे बस में नहीं(और हो भी अगर, तेरी कम-माएगी मा मुदावा नहीं)हाँ मगर तेरी दिल-जूई के वास्तेमेरी गर्दन पे यूँ तेरा ख़ंजर रहे(तेरी दानिस्त में)खेल जारी रहे
मुझे यक़ीं हैकि तुम कौन मेहंदी सेजब मेरे अदू का नामअपनी ख़ूबसूरत कलाई पर लिखोगीतोमेरा ख़याल आते हीआख़िर एक दिनउस मनहूस के नाम परख़ुद हीबड़ा सा काँटा लगा दोगीऔर दूसरी कलाई परमेरा नाम लिख करउसे देर तक चूमती रहोगीमैं उस लम्हे के इंतिज़ार मेंमुतबादिल कलाइयों की जानिब से मौसूलाहज़ारों दिल-पज़ीर आफ़रींमुसलसल मुस्तरद किए जा रहा हूँक्यूँकिदुनिया उम्मीद पर क़ाएम है
इश्क़-ए-वतन में जब से दीवाना हो गया हूँपैदा शजर हो जिस से वो दाना बन गया हूँबे-शक ज़मीं में मुझ को ख़ुश हो के अब मिला तूदर्द-ए-ज़बाँ हूँ सब का अफ़्साना हो गया हूँक़ुर्बान हूँ अदू के ज़ोर-ओ-सितम के सदक़ेसह सह के रंज-ओ-ग़म को मर्दाना हो गया हूँदिल में चराग़ जब से रौशन हुआ वतन कापरवा न जो कि कुछ भी परवाना हो गया हूँसाक़ी शराब तेरी अब क्या असर करेगीहुब्ब-ए-वतन की मय पी मस्ताना हो गया हूँतासीर-ए-इश्क़ यारो देखी तिरी निरालीपी पी शराब-ए-उल्फ़त बेगाना हो गया हूँ
कहा जो मरते हैं तुम पर तो हँस के फ़रमायामरें तुम्हारे अदू दूर पार होली में
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