aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kambakht"
मैं भूल जाऊँ तुम्हेंअब यही मुनासिब हैमगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँकि तुम तो फिर भी हक़ीक़त होकोई ख़्वाब नहींयहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँकम-बख़्तभुला न पाया वो सिलसिलाजो था ही नहींवो इक ख़यालजो आवाज़ तक गया ही नहींवो एक बातजो मैं कह नहीं सका तुम सेवो एक रब्तजो हम में कभी रहा ही नहींमुझे है याद वो सबजो कभी हुआ ही नहीं
गुल हुई जाती है अफ़्सुर्दा सुलगती हुई शामधुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए-महताब से रातऔर मुश्ताक़ निगाहों की सुनी जाएगीऔर उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हातउन का आँचल है कि रुख़्सार कि पैराहन हैकुछ तो है जिस से हुई जाती है चिलमन रंगींजाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छाँव मेंटिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक कि नहींआज फिर हुस्न-ए-दिल-आरा की वही धज होगीवही ख़्वाबीदा सी आँखें वही काजल की लकीररंग-ए-रुख़्सार पे हल्का सा वो ग़ाज़े का ग़ुबारसंदली हाथ पे धुंदली सी हिना की तहरीरअपने अफ़्कार की अशआर की दुनिया है यहीजान-ए-मज़मूँ है यही शाहिद-ए-मअ'नी है यहीआज तक सुर्ख़ ओ सियह सदियों के साए के तलेआदम ओ हव्वा की औलाद पे क्या गुज़री है?मौत और ज़ीस्त की रोज़ाना सफ़-आराई मेंहम पे क्या गुज़रेगी अज्दाद पे क्या गुज़री है?इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़्लूक़क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती हैये हसीं खेत फटा पड़ता है जौबन जिन का!किस लिए इन में फ़क़त भूक उगा करती हैये हर इक सम्त पुर-असरार कड़ी दीवारेंजल-बुझे जिन में हज़ारों की जवानी के चराग़ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल-गाहेंजिन के परतव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगेलेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंटहाए उस जिस्म के कम्बख़्त दिल-आवेज़ ख़ुतूतआप ही कहिए कहीं ऐसे भी अफ़्सूँ होंगे
रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसेंरूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साएदिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देनेमेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए
ओ देस से आने वाले बताअब नाम-ए-ख़ुदा होगी वो जवाँमैके में है या ससुराल गईदोशीज़ा है या आफ़त में उसेकम-बख़्त जवानी डाल गईघर पर ही रही या घर से गईख़ुश-हाल रही ख़ुश-हाल गईओ देस से आने वाले बता
मकड़े ने कहा दिल में सुनी बात जो उस कीफाँसूँ इसे किस तरह ये कम-बख़्त है दानासौ काम ख़ुशामद से निकलते हैं जहाँ मेंदेखो जिसे दुनिया में ख़ुशामद का है बंदाये सोच के मक्खी से कहा उस ने बड़ी बीअल्लाह ने बख़्शा है बड़ा आप को रुत्बाहोती है उसे आप की सूरत से मोहब्बतहो जिस ने कभी एक नज़र आप को देखाआँखें हैं कि हीरे की चमकती हुई कनियाँसर आप का अल्लाह ने कलग़ी से सजायाये हुस्न ये पोशाक ये ख़ूबी ये सफ़ाईफिर उस पे क़यामत है ये उड़ते हुए गानामक्खी ने सुनी जब ये ख़ुशामद तो पसीजीबोली कि नहीं आप से मुझ को कोई खटकाइंकार की आदत को समझती हूँ बुरा मैंसच ये है कि दिल तोड़ना अच्छा नहीं होताये बात कही और उड़ी अपनी जगह सेपास आई तो मकड़े ने उछल कर उसे पकड़ाभूका था कई रोज़ से अब हाथ जो आईआराम से घर बैठ के मक्खी को उड़ाया
बेकसों के ख़ून में डूबे हुए हैं तेरे हातक्या चबा डालेगी ओ कम्बख़्त सारी काएनात
कोई पुकारती है दिल सख़्त भीगती हूँकाँपे है मेरी छाती यक-लख़्त भीगती हूँकपड़े भी तर-ब-तर हैं और सख़्त भीगती हूँजल्दी बुला ले मुझ को कम्बख़्त भीगती हूँक्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
जाने किस कोख ने जना इस कोजाने किस सेहन में जवान हुईजाने किस देस से चली कम-बख़्तवैसे ये हर ज़बान बोलती हैज़ख़्म खिड़की की तरह खोलती है
ये कुछ रेंगता कुछ घिसटता हुआपुराने शिवाले की जानिब चलाजहाँ दूध इस को पिलाया गयापढ़े पंडितों ने कई मंतर ऐसेये कम-बख़्त फिर से जिलाया गयाशिवाले से निकला वो फुंकारतारग-ए-अर्ज़ पर डंक सा मारताबढ़ा मैं कि इक बार फिर सर कुचल दूँइसे भारी क़दमों से अपने मसल दूँक़रीब एक वीरान मस्जिद थी, मस्जिद मेंये जा छुपाजहाँ इस को पेट्रोल से ग़ुस्ल दे करहसीन एक तावीज़ गर्दन में डाला गयाहुआ जितना सदियों में इंसाँ बुलंदये कुछ उस से ऊँचा उछाला गयाउछल के ये गिरजा की दहलीज़ पर जा गिराजहाँ इस को सोने की केचुल पहनाई गईसलीब एक चाँदी की सीने पे उस के सजाई गईदिया जिस ने दुनिया को पैग़ाम-ए-अम्नउसी के हयात-आफ़रीं नाम परउसे जंग-बाज़ी सिखाई गईबमों का गुलू-बंद गर्दन में डालाऔर इस धज से मैदाँ में उस को निकालापड़ा उस का धरती पे सायातो धरती की रफ़्तार रुकने लगीअँधेरा अँधेरा ज़मीं सेफ़लक तक अँधेराजबीं चाँद तारों की झुकने लगी
तबीअत जब्रिया तस्कीन से घबराई जाती हैहँसूँ कैसे हँसी कम-बख़्त तू मुरझाई जाती हैबहुत चमका रहा हूँ ख़ाल-ओ-ख़त को सई-ए-रंगीं सेमगर पज़मुर्दगी सी ख़ाल-ओ-ख़त पर छाई जाती हैउमीदों की तजल्ली ख़ूब बरसी शीशा-ए-दिल परमगर जो गर्द थी तह में वो अब तक पाई जाती हैजवानी छेड़ती है लाख ख़्वाबीदा तमन्ना कोतमन्ना है कि उस को नींद ही सी आई जाती हैमोहब्बत की निगूँ-सारी से दिल डूबा सा रहता हैमोहब्बत दिल की इज़्मेहलाल से शर्माई जाती हैफ़ज़ा का सोग उतरा आ रहा है ज़र्फ़-ए-हस्ती मेंनिगाह-ए-शौक़ रूह-ए-आरज़ू कजलाई जाती हैये रंग-ए-मय नहीं साक़ी झलक है ख़ूँ-शूदा दिल कीजो इक धुँदली सी सुर्ख़ी अँखड़ियों में पाई जाती हैमिरे मुतरिब न दे लिल्लाह मुझ को दावत-ए-नग़्माकहीं साज़-ए-ग़ुलामी पर ग़ज़ल भी गाई जाती है
कौन आवारा हवाओं का सुबुक-बार हुजूमआह एहसास की ज़ंजीर गराँ टूट गईऔर सरमाया-ए-अन्फ़ास परेशाँ न रहामेरे सीने में उलझने लगी फ़रियाद मिरीफिर निगाहों पे उमँड आया है तारीक धुआँटिमटिमाना है मिरे साथ ये मायूस चराग़आज मिलता नहीं अफ़्सोस पतंगों का निशाँमेरे सीने में उलझने लगी फ़रियाद मिरीटूट कर रह गई अन्फ़ास की ज़ंजीर-ए-गिराँतोड़ डालेगा ये कम्बख़्त मकाँ की दीवारऔर मैं दब के इसी ढेर में रह जाऊँगाजी उलझता है मिरी जान पे बन जाएगीथक गया आज शिकारी की कमाँ टूट गईलौट आया हूँ बहुत दूर से ख़ाली हाथोंआज उम्मीद का दिन बीत गया शाम हुईमैं ने चाहा भी मगर तुम से मोहब्बत न हुईकि चुके अब तो ख़ुदा के लिए ख़ामोश रहोएक मौहूम सी ख़्वाहिश थी फ़लक छूने कीज़ंग-आलूद मोहब्बत को तुझे सौंप दियासर्द हाथों से मिरी जान मिरे होंट न सीगर कभी लौट के आ जाए वही साँवली रातख़ुश्क आँखों में झलक आए न बे-सूद नमीज़लज़ला उफ़ ये धमाका ये मुसलसल दस्तकबे-अमाँ रात कभी ख़त्म भी होगी कि नहींउफ़ ये मग़्मूम फ़ज़ाओं का अलमनाक सुकूतमेरे सीने में दबी जाती है आवाज़ मिरीतीरगी उफ़ ये धुँदलका मिरे नज़दीक न आये मिरे हाथ पे जलती हुई क्या चीज़ गिरीआज इस अश्क-ए-नदामत का कोई मोल नहींआह एहसास की ज़ंजीर-ए-गिराँ टूट गईऔर ये मेरी मोहब्बत भी तुझे जो है अज़ीज़कल ये माज़ी के घने बोझ में दब जाएगीकौन आया है ज़रा एक नज़र देख तो लोक्या ख़बर वक़्त दबे पाँव चला आया होज़लज़ला उफ़ ये धमाका ये मुसलसल दस्तकखटखटाता है कोई देर से दरवाज़े कोउफ़ ये मग़्मूम फ़ज़ाअों का अलमनाक सुकूतकौन आया है ज़रा एक नज़र देख तो लोतोड़ डालेगा ये कम्बख़्त मकाँ की दीवारऔर मैं दब के इसी ढेर में रह जाऊँगा
अभी नहीं अभी ज़ंजीर-ए-ख़्वाब बरहम हैअभी नहीं अभी दामन के चाक का ग़म हैअभी नहीं अभी दर बाज़ है उमीदों काअभी नहीं अभी सीने का दाग़ जलता हैअभी नहीं अभी पलकों पे ख़ूँ मचलता हैअभी नहीं अभी कम-बख़्त दिल धड़कता है
ऐ ख़ुशा क़िस्मत तिरी जमुना ख़ुशा तेरे नसीबवाह-वा तेरे मुक़द्दर वाह-वा तेरे नसीबतू ने देखी है बहुत दिन मुरली वाले की अदादोनों-आलम के हसीनों से निराले की अदाऔर सुनी बंसी की है बरसों सदा-ए-दिल-नवाज़दास्तान-ए-दर्द-ए-दिल अफ़साना-ए-सोज़-ओ-गुदाज़महशरिस्तान-ए-अलम कम्बख़्त है कर दिल को चाकचीर पहलू को कि निकलें नाला-हा-ए-दर्द-नाक
दौड़े जाती है मुस्कुराते इक दस्तक परवो मोहब्बत है उदास हो दर से उसे वापस मोड़ देबन जा बे-जान इक ज़िंदा लाशअकेले बैठ और कम्बख़्त सोचना छोड़ दे
दूर से ज़ालिम पपीहे की सदा आती हुईपय-ब-पय कम-बख़्त पी-पी कह कर उकसाती हुई
वो इक शख़्स जिस की शबाहत से मुझ कोबहुत ख़्वार ओ शर्मिंदा होना पड़ा थाक़बा रूह की मल्गजी हो गई थीकई बार दामन को धोना पड़ा थावो मुझ जैसी आँखें जबीं होंट अबरूकि बाक़ी न था कुछ भी फ़र्क़-ए-मन-ओ-तूवही चाल आवाज़ क़द रंग मद्धमवही तर्ज़-ए-गुफ़्तार ठहराओ कम कमख़ुदा जाने क्या क्या मशाग़िल थे उस केमिरे पास लोग आए आ आ के लौटेकई मुझ से उलझे कई मुझ से झगड़ेमैं रोता रहा बे-गुनाही का रोनामिरे जुर्म पर लोग थे क़हक़हा-ज़नन काम आया अपनी तबाही का रोनावो ज़ुल्मत में छुप छुप के दिन काटता थामैं दिन के उजाले में मारा गया थासुना रात वो मर गया क्या ग़ज़ब हैउसे दफ़्न कर आए लोगों को देखोमैं कम-बख़्त नज़रों से ओझल ही कब थाये क्या कर दिया हाए लोगों को देखो
ख़ुद ही सरगोशियाँ करते हैं कोई जैसे कहेफिर पलट आए ये कम-बख़्त वही शाम-ओ-सहर
हाँ ऐ मसाफ़-ए-हस्ती! मत पूछ मुझ से क्या हूँइक अर्सा-ए-बला हूँ इक लुक़मा-ए-फ़ना हूँमजबूरियों ने डाला गर्दन में मेरी फंदाख़ुद-कर्दा-ए-वफ़ा हूँ जाँ-दादा-ए-रज़ा हूँसय्याद हादसे का करता है मेरा पीछामुर्ग़-ए-बुरीदा-पर हूँ सैद-ए-शिकस्ता-पा हूँहै ज़ात मेरी मजमा' सारी बुराइयों काकहने को मैं बड़ा हूँ लेकिन बहुत बुरा हूँआज़ादियों की मुझ पर तोहमत ही है सरासरमैं क़ैदी-ए-हवस हूँ मैं बंदा-ए-हवा हूँइक बात हो बताऊँ इक दर्द हो सुनाऊँरोऊँ भला कहाँ तक कब तक पड़ा कराहूँकम-बख़्त दिल कुछ ऐसा मैं साथ ले के आयाइक लम्हा जिस के हाथों दुनिया में सुख न पायाजो जोश इस में उट्ठा हालात ने दबायाजो शो'ला इस में भड़का तक़दीर ने बुझायाउम्मीद का ये ग़ुंचा खिलते कभी न देखाये आरज़ू का पौदा फलता नज़र न आयागो इस में मौजज़न थी क़ौम ओ वतन की उल्फ़तलेकिन ग़रज़ ने इस को कुछ और ही सिखायाहोती नहीं रसाई उम्मीद के उफ़ुक़ तकतूल-ए-अमल ने इस को इक जाल में फँसायाकी रहबरी ख़िरद ने हर-चंद रहनुमाईइस जुहद पर भी लेकिन खुलती नहीं सच्चाईपाया न मैं ने अब तक मक़्सद का अपने साहिलकी बहर-ए-मा'रफ़त में दिन रात आश्नाईइस जुस्तुजू में मैं ने की सैर-ए-तूर-ओ-ऐमनपर्बत को घर बनाया जंगल से लौ लगाईमंदिर को जा के देखा गिरजा में जा के ढूँडामस्जिद को छान मारा उस की न दीद पाईजोगी का रूप धारा बन में किया गुज़ारातन पर भभूत मल कर धूनी बहुत रमाईजप तप में उम्र अपनी मैं ने बसर की अक्सरबन बन के पीर-ए-राहिब जा ख़ानक़ाह बसाईसूफ़ी भी बन के देखा और रिंद-ए-बे-रिया भीकर नारा-ए-अना-अल-हक़ इक खलबली मचाईफिरती हैं मारी मारी मुश्ताक़-ए-जल्वा आँखेंपर इक झलक से बढ़ कर देता नहीं दिखाईउठ जा नज़र से मेरी हाँ ऐ हिजाब-ए-हस्तीहुस्न-ए-अज़ल निहाँ है ज़ेर-ए-नक़ाब-ए-हस्तीये ज़िंदगी-ए-इंसाँ इक ख़्वाब है परेशाँबेदारी-ए-अदम है ता'बीर-ए-ख़्वाब-ए-हस्तीदेखें अगर तो क्यूँ-कर हम जलवा-ए-मआरिफ़तू ज़ुल्मत-ए-नज़र है ऐ आफ़्ताब-ए-हस्तीतस्कीं को ज़हर-ए-क़ातिल आब-ओ-हवा-ए-आलमराहत का दुश्मन-ए-जाँ हर इंक़लाब-ए-हस्तीऐ तिश्ना-ए-हक़ीक़त धोके में तू न आनाइक दाम-ए-पुर-ख़तर है मौज-ए-सराब-ए-हस्तीचाहे अगर रिहाई पेश-अज़-फ़ना फ़ना होपादाश-ए-जुर्म-ए-हस्ती है ये अज़ाब-ए-हस्ती
मुझे मालूम था तुम रस्ता बदलोगेतभी आँखों में ख़्वाबों को ज़रा सी भी जगह न दीमगर ये दिलमगर ये दिल बहुत कम्बख़्त है सुनता नहीं मेरीसो अब जो तुम ने अपनी राह बदली हैतो अब मासूम बन के रोता-धोता हैमुझे कहता है फिर आग़ोश में ले लोमुझे सीने में फिर रख लोमैं अब हो बात मानूँगामगर वो क्या है नाँ उस पर तुम्हारा नाम कंदा हैतुम्हारा नाम अब वहशत से बढ़ कर कुछ नहीं देताउसी की चीज़ होती है कि जिस का नाम लिक्खा होतुम्हारी सारी चीज़ें तो तुम्हें लौटा चुकी हूँ मैंसुनो ये दिल भी ले जाओऔर अपनी चीज़ें अब सँभाल कर रखनादोबारा से तुम्हारे नाम का कुछ भीकभी भी और कहीं से भीकिसी तरह भी मेरे पास न आएमैं सय्यद हूँमैं जो इक बार दे दूँ फिर उसे वापस नहीं लेती
कोई मुख़्लिस मुझे तुझ सा न मिला तेरे बादयाद आती है बहुत तेरी वफ़ा तेरे बादहम हैं जीने से अजल हम से ख़फ़ा तेरे बादहम से दिल दिल से है आराम जुदा तेरे बादकोई जामा' न रहा मुंतशिर आते हैं नज़रइल्म-ओ-फ़न दानिश-ओ-दीं सिद्क़-ओ-सफ़ा तेरे बाददौलत-ए-फ़क़्र अमीरों में नहीं मिलती अबफिरते हैं झाँकते दर-दर फ़ुक़रा तेरे बादबे-सबब तुझ से वफ़ादार ने मुँह मोड़ लियामुँह दिखाते नहीं अब अहल-ए-वफ़ा तेरे बादबहस रहती थी कि है कौन वफ़ा का पाबंदहैफ़ ये उक़्दा-ए-सर-बस्ता खुला तेरे बादहद को पहुँची थी मोहब्बत मिरी तेरे आगेहो गई हद से ये कम-बख़्त सिवा तेरे ब'अदगंज-ए-उम्मीद-ओ-तरब छीन के रू-पोश हुईसामने आई न फिर मेरे क़ज़ा तेरे बाददिल को बद-ज़न न कर ऐ हादिम-ए-लज़्ज़ात के सैदजान-ए-शीरीं का नहीं कुछ भी मज़ा तेरे बाद
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