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नज़्म
कपड़े भी तर-ब-तर हैं और सख़्त भीगती हूँ
जल्दी बुला ले मुझ को कम्बख़्त भीगती हूँ
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
महशरिस्तान-ए-अलम कम्बख़्त है कर दिल को चाक
चीर पहलू को कि निकलें नाला-हा-ए-दर्द-नाक
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
कम-बख़्त दिल कुछ ऐसा मैं साथ ले के आया
इक लम्हा जिस के हाथों दुनिया में सुख न पाया
ग़ुलाम भीक नैरंग
नज़्म
हद को पहुँची थी मोहब्बत मिरी तेरे आगे
हो गई हद से ये कम-बख़्त सिवा तेरे ब'अद