aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "naaqa"
हरीम-ए-महमिल में आ गया हूँ सलाम ले लोसलाम ले लो कि मैं तुम्हारा अमीन-ए-क़ासिद ख़जिल मुसाफ़िर अज़ा की वादी से लौट आयामैं लौट आया मगर सरासीमा इस तरह सेकि पिछले क़दमों पलट के देखा न गुज़रे रस्तों के फ़ासलों कोजहाँ पे मेरे निशान-ए-पा अब थके थके से गिरे पड़े थेहरीम-ए-महमिल में वो सफ़ीर-ए-नवेद-परवरजिसे ज़माने के पस्त ओ बाला ने इतने क़िस्से पढ़ा दिए थेजो पहले क़रनों की तीरगी को उजाल देतेतुम्हें ख़बर हैये मेरा सीना क़दीम अहराम में अकेला वो इक हरम थाअज़ीम राज़ों के कोहना ताबूत जिस की कड़ियों में बस रहे थेउन्हीं हवाओं का डर नहीं थान सहरा-ज़ादों के नस्ली का ही उन की गिर्द-ए-ख़बर को पहुँचेहरीम-ए-महमिल में वो अमानत का पासबाँ हूँजो चर्म-ए-आहू के नर्म काग़ज़ पे लिक्खे नामे को ले के निकलावही कि जिस के सवार होने को तुम ने बख़्शा जहाज़-ए-सहरातवील राहों में ख़ाली मश्कों का बार ले कर हज़ार सदियाँ सफ़र में गर्दांकहीं सराबों की बहती चाँदी कहीं चटानों की सख़्त क़ाशेंमयान-ए-राह-ए-सफ़र खड़े थे जकड़ने वाले नज़र के लोभीमगर न भटका भटकने वालाजो दम लिया तो अज़ा में जा करहरीम-ए-महमिल सुनो फ़साने जो सुन सको तोमैं चलते चलते सफ़र के आख़िर पे ऐसी वादी में जा के ठहराऔर उस पे गुज़रे हरीस लम्हों के उन निशानों को देख आयाजहाँ के नक़्शे बिगड़ गए हैंजहाँ के तबक़े उलट गए हैंवहाँ की फ़सलें ज़क़्क़ूम की हैंहवाएँ काली हैं राख उड़ कर खंडर में ऐसे फुँकारती हैकि जैसे अज़दर चहार जानिब से जबड़े खोले ग़दर मचातेज़मीं पे कीना निकालते होंकसीफ़ ज़हरों की थैलियों को ग़ज़ब से बाहर उछालते होंमुहीब साए में देवताओं का रक़्स जारी थाटूटे हाथों की हड्डियों से वो दोहल-ए-बातिल को पीटते थेज़ईफ़ कव्वों ने अहल-ए-क़र्या की क़ब्रें खोदींतू उन के नाख़ुन नहीफ़ पंजों से झड़ के ऐसे बिखर रहे थेचकोंदारों ने चबा के फेंके हों जैसे हड्डी के ख़ुश्क रेज़ेहरीम-ए-महमिल वही वो मंज़िल थी जिस के सीने पे मैं तुम्हारी नज़र से पहुँचा उठाए मेहर ओ वफ़ा के नामेवहीं पे बैठा था सर-ब-ज़ानू तुम्हारा महरमखंडर के बोसीदा पत्थरों पर हज़ीन ओ ग़मगींवहीं पे बैठा थाक़त्ल-नामों के महज़रों को वो पढ़ रहा थाजो पस्तियों के कोताह हाथों ने उस की क़िस्मत में लिख दिए थेहरीम-ए-महमिल मैं अपने नाक़ा से नीचे उतरा तो मैं ने देखा कि उस की आँखें ख़मोश ओ वीराँग़ुबार-ए-सहरा मिज़ा पे लर्ज़ां था रेत दीदों में उड़ रही थीमगर शराफ़त की एक लौ थी कि उस के चेहरे पे नर्म हाला किए हुए थीवो मेरे लहजे को जानता थाहज़ार मंज़िल की दूरियों के सताए क़ासिद के उखड़े क़दमों की चाप सुनते ही उठ खड़ा थादयार-ए-वहशत में बस रहा थापे तेरी साँसों के ज़ेर-ओ-बम से उठी हरारत से आश्ना थावो कह रहा था यहाँ से जाओ कि याँ ख़राबों के कार-ख़ाने हैंरोज़ ओ शब के जो सिलसिले हैं खुले ख़सारों की मंडियाँ हैंवो डर रहा था तुम्हारा क़ासिद कहीं ख़सारों में बट न जाएहरीम-ए-महमिल मैं क्या बताऊँ वहीं पे खोया था मेरा नाक़ाफ़क़त ख़राबे के चंद लम्हे ही उस के गूदे को खा गए थेउसी मक़ाम-ए-तिलिस्म-गर में वो उस्तख़्वानों में ढल गया थाजहाँ पे बिखरा पड़ा था पहले तुम्हारे महरम का अस्प-ए-ताज़ीऔर अब वो नाक़ा के उस्तुख़्वाँ भीतुम्हारे महरम के अस्प-ए-ताज़ी के उस्तख़्वानों में मिल गए हैंहरीम-ए-महमिल वही वो पत्थर थे जिन पे रक्खे थे मैं ने मेहर ओ वफ़ा के नामेजहाँ पे ज़िंदा रुतों में बाँधे थे तुम ने पैमान ओ अहद अपनेमगर वो पत्थर कि अब अजाइब की कारगह हैंतुम्हारे नामे की उस इबारत को खा गए हैंशिफ़ा के हाथों से जिस को तुम ने रक़म किया थासो अब न नाक़ा न कोई नामा न ले के आया जवाब-ए-नामामैं ना-मुराद ओ ख़जिल मुसाफ़िरमगर तुम्हारा अमीन क़ासिद अज़ा की वादी से लौट आयाऔर उस नजीब ओ करीम महरम-ए-वफ़ा के पैकर को देख आयाजो आने वाले दिनों की घड़ियाँ अबद की साँसों से गिन रहा है
सफ़ीर-ए-लैला ये क्या हुआ हैशबों के चेहरे बिगड़ गए हैंदिलों के धागे उखड़ गए हैंशफ़ीक़ आँसू नहीं बचे हैं ग़मों के लहजे बदल गए हैंतुम्ही बताओ कि इस खंडर में जहाँ पे मकड़ी की सनअतें होंजहाँ समुंदर हों तीरगी केसियाह-जालों के बादबाँ होंजहाँ पयम्बर ख़मोश लेटे हों बातें करती हों मुर्दा रूहेंसफ़ीर-ए-लैला तुम्ही बताओ जहाँ अकेला हो दास्ताँ-गोवो दास्ताँ-गो जिसे कहानी के सब ज़मानों पे दस्तरस होशब-ए-रिफ़ाक़त में तूल-ए-क़िस्सा चराग़ जलने तलक सुनाएजिसे ज़बान-ए-हुनर का सौदा हो ज़िंदगी को सवाल समझेवही अकेला हो और ख़मोशी हज़ार सदियों की साँस रोकेवो चुप लगी हो कि मौत बाम-ए-फ़लक पे बैठी ज़मीं के साए से काँपती होसफ़ीर-ए-लैला तुम्ही बताओ वो ऐसे दोज़ख़ से कैसे निपटेदयार-ए-लैला से आए नामे की नौ इबारत को कैसे पढ़ लेपुराने लफ़्ज़ों के इस्तिआरों में गुम मोहब्बत को क्यूँके समझेसफ़ीर-ए-लैला अभी मलामत का वक़्त आएगा देख लेनाअगर मुसिर हो तो आओ देखोयहाँ पे बैठो ये नामे रख दोयहीं पे रख दो इन्ही सिलों परकि इस जगह पर हमारी क़ुर्बत के दिन मिले थेवो दिन यहीं पर जुदा हुए थे इन्ही सिलों परऔर अब ज़रा तुम नज़र उठाओ मुझे बताओ तुम्हारा नाक़ा कहाँ गया हैबुलंद टख़नों से ज़र्द रेती पे चलने वाला सबीह नाक़ावो सुर्ख़ नाक़ा सवार हो कर तुम आए जिस पर बुरी सरा मेंवही कि जिस की महार बाँधी थी तुम ने बोसीदा उस्तुख़्वाँ सेवो अस्प-ए-ताज़ी के उस्तुख़्वाँ थेमुझे बताओ सफ़ीर-ए-लैला किधर गया वोउधर तो देखो वो हड्डियों का हुजूम देखोवही तुम्हारा अज़ीज़ साथी सफ़र का मोनिसप अब नहीं हैऔर अब उठाओ सिलों से नामेपढ़ो इबारत जो पढ़ सको तोक्या डर गए हो कि सतह-ए-काग़ज़ पे जुज़ सियाही के कुछ नहीं हैख़जिल हो इस पर कि क्यूँ इबारत ग़ुबार हो कर नज़र से भागीसफ़ीर-ए-लैला ये सब करिश्मे इसी खंडर ने मिरी जबीं पर लिखे हुए हैंयही अजाइब हैं जिन के सदक़े यहाँ परिंदे न देख पाओगेऔर सदियों तलक न उतरेगी याँ सवारीन चोब-ए-ख़ेमा गड़ेगी याँ परसफ़ीर-ए-लैला ये मेरे दिन हैंसफ़ीर-ए-लैला ये मेरी रातेंऔर अब बताओ कि इस अज़िय्यत में किस मोहब्बत के ख़्वाब देखूँमैं किन ख़ुदाओं से नूर माँगूँमगर ये सब कुछ पुराने क़िस्से पराई बस्ती के मुर्दा क़ज़िएतुम्हें फ़सानों से क्या लगाओतुम्हें तो मतलब है अपने नाक़ा से और नामे की उस इबारत सेसतह-ए-काग़ज़ से जो उड़ी हैसफ़ीर-ए-लैला तुम्हारा नाक़ामैं उस के मरने पर ग़म-ज़दा हूँतुम्हारे रंज ओ अलम से वाक़िफ़ बड़े ख़सारों को देखता हूँसो आओ उस की तलाफ़ी कर दूँ ये मेरे शाने हैं बैठ जाओतुम्हें ख़राबे की कारगह से निकाल आऊँदयार-ए-लैला को जाने वाली हबीब राहों पे छोड़ आऊँ
फिर आ गया है मुल्क में क़ुर्बानियों का मालकी इख़्तियार क़ीमतों ने राकेटों की चालक़ामत में बकरा ऊँट की क़ीमत का हम-ख़यालदिल बैठता है उठते ही क़ुर्बानी का सवालक़ीमत ने आदमी ही को बकरा बना दियाबकरे को मिस्ल-ए-नाक़ा-ए-लैला बना दिया
जो तू तस्वीर करता हैजो मैं तहरीर करता हूँन तेरा है न मेरा हैमगर अपना है ये जब तकइसे पढ़ने में कितनी देर लगती हैअभी माहौल को चारों तरफ़ सेहब्स के सहरा ने घेरा हैमगर कब तकहवा चलने में कितनी देर लगती हैकोई ज़ंजीर है शायद हमारे पाँव मेंऔर राह में काफ़ी अंधेरा हैमगर कब तकदिया जलने में कितनी देर लगती हैहवाएँ बादबानों से उलझती और कहीं नाक़ा-सवारों कोकोई पैग़ाम देती शाम के आँचल को थामेसाहिलों की सम्त आती हैंपरिंदे दाएरों में उड़ते फिरतेअब्र की चादर में लिपटेरंग बरसातेफ़ज़ाओं में सफ़र की दास्ताँ लिखतेठिकानों की तरफ़ जाते हुएमंज़र को अपने अक्स में तब्दील करते हैंअचानक सर-फिरी मौजेंमुझे छू कर गुज़र जाती हैंऔर मैं अपने तलवों से निकलती सनसनाती रीत की सरगोशियाँमहसूस करता हूँवही मैं हूँ वही अस्बाब-ए-वहशत हैं वही साहिलवही तू है वही हँसती हुई आँखेंतिरी आँखों में रंगों और ख़्वाबों के जज़ीरेजगमगाते हैंसर-ए-मिज़्गाँ रुपहली साअ'तों के इस्तिआ'रे मुस्कुराते हैंहँसी महताब बनती हैफिर इस महताब के चारों तरफ़ आवाज़ का हाला उभरता हैऔर इस हाले में तेरी उँगलियाँनादीदा मंज़र को तिलिस्म-ए-ख़्वाब से आज़ाद करती हैंतिरे हाथों की जुम्बिशधूप छाँव से धनक तरतीब दे करख़ाली तस्वीरों में ख़द्द-ओ-ख़ाल को आबाद करती हैतिरी पलकें झपकती हैंसितारे से सितारा आन मिलता हैकि जैसे शाम होते हीसुबुक आसार लहरों मेंकिनारे से किनारा आन मिलता हैये जो कुछ हैबहुत ही ख़ूबसूरत हैमगर उस के लिए हैजो ये सब महसूस करता हैतुझे मालूम भी हो जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता हैअभी दिन का थका हारा मुसाफ़िर धूप के खे़मे समेटेदूर पानी में उतरने के लिएबे-ताब है देखोये नीला आसमाँअपनी गराँ ख़्वाबी में ख़ुद ग़र्क़ाब है देखोन जाने क्योंसमुंदर देखने वालों कोसूरज डूबने का ख़ौफ़ रहता हैकोई है जिस को इस्म-ए-आब आता होकिनारों की तरह हर लम्हा कट गिरता होज़ेर-ए-आब आता होसमुंदर आसमाँ की राहदारी हैमगर इस राहदारी तक पहुँचने का कोई रस्ताबड़ी मुश्किल से मिलता हैये इस्म-ए-आबसाहिल पर खड़े नज़्ज़ारा-बीनों की समझ में किस तरह आएकि ये तो डूबने वालों पे भीमुश्किल से खुलता हैमगर कब तकइसे खुलने में कितनी देर लगती है
मेरे हाथ पे लिक्खा क्या हैउम्र के ऊपर बर्क़ का गहरा साया क्या हैकौन ख़फ़ा हैराह का बूढ़ा पेड़ झुका है चिड़ियाँ हैं चुप-चापआती जाती रुत के बदले गर्द की गहरी छापगर्द के पीछे आने वाले दौर की धीमी थापरस्ता क्या है मंज़िल क्या हैमेरे साथ सफ़र पर आते-जाते लोगो महशर क्या हैमाज़ी हाल का बदला बदला मंज़र क्या हैमैं और तू क्या चीज़ हैं तिनके पत्ते एक निशानअक्स के अंदर टुकड़े टुकड़े ज़ाहिर में इंसानकब के ढूँड रहे हैं हम सब अपना नख़लिस्ताननाक़ा क्या है महमिल क्या हैशहर से आते-जाते लोगो देखो राह से कौन गया हैजलते काग़ज़ की ख़ुश्बू में ग़र्क़ फ़ज़ा हैचारों सम्त से लोग बढ़े हैं ऊँचे शहर के पासआज अँधेरी रात में अपना कौन है राह-शनासख़्वाब की हर ता'बीर में गुम है अच्छी शय की आसदिन क्या शय है साया क्या हैघटते-बढ़ते चाँद के अंदर दुनिया क्या हैफ़र्श पे गिर कर दिल का शीशा टूट गया है
मैं अगर शाइ'र था मौला तो मिरी ओहदा-बराई क्या थी आख़िरशाइ'री में मुतकफ़्फ़िल था तो ये कैसी ना-मुनासिब एहतिमालीक्या करूँ मैंबंद कर दूँ अपना बाब-ए-लफ़्ज़-ओ-मा'नीऔर कहफ़ के ग़ार में झाँकूँ जहाँ बैठे हुएअसहाब माबूद-ए-हक़ीक़ी की इबादत में मगन हैंऔर सग-ए-ताज़ी सा चौकीदार उन के पास बैठूँवहदत-ओ-तौहीद का पैग़ाम सुन करविर्द की सूरत उसे दोहराता जाऊँपूछता हूँक्या मिरी मश्क़-ए-सुख़न तौहीद की अज़ली शनासाओ क़र्ज़ के बिगताशन की दाई' नहीं हैमैं तो रासुल-माल सारा पेशगी ही दे चुका हूँक़र्ज़ की वापस अदाई मेंमिरे अल्फ़ाज़ का सारा ज़ख़ीरा लुट चुका हैशे'र को हर्फ़-ओ-निदा में ढालनातस्बीह-ओ-तहलील-ओ-इबादत से कहाँ कमतर है मौलाशाइ'री जुज़वेस्त-अज़-पैग़म्बरी किस ने कहा थामैं तो इतना जानता हूँमेरी तमजीद-ओ-परसतिश लफ़्ज़ की क़िरात में ढलती हैतो फिर तख़्लीक़ का वाज़ेह अमल तस्बीह या माला के मनकों की तरह है
और अकेला हूँ भी तो पैदल चला जाऊँगा मैंलैला-ए-महमिल-नशीं को कैसे समझाऊँगा मैंनज्द का नाक़ा कहाँ से ढूँड कर लाऊँगा मैंपाँच छे बच्चों को आख़िर कैसे बहलाऊँगा मैंएक हो तो गोद मैं ले लूँ कि वो भारी नहींमैं मगर इंसान हूँ ऐ दोस्तो लारी नहीं
चीज़ अगरचे हूँ मैं नन्हीलेकिन हूँ मैं काम की कैसीआक़ा को भी मेरी ज़रूरतनौकर को भी मेरी हाजतकोई जहाँ में घर नहीं ऐसाजिस में काम नहीं है मेराहाल सुनाती हूँ मैं अपनाकान लगा कर सारा सुननामिट्टी में से लोहा निकालालोहे का फ़ौलाद बनायातार फिर उस फ़ौलाद का खींचाहो गया वो तब दुबला पतलाकर दिया उस को टुकड़े टुकड़ेहो गए जब वो टुकड़े छोटेकल में इन टुकड़ों को डालाबन गई जब मैं सब को निकालाएक तरफ़ अब नोक है बच्चोएक तरफ़ है नाका देखोसूई जहाँ में अब कहलाईकाम ज़माने भर के आईकाम हर इक के तुम भी आनामानो 'जौहर' का फ़रमाना
जो बना दे हज़रत-ए-आदम को मुर्दा ख़ाक सेकर दे जो आरास्ता बे-जाँ को रूह-ए-पाक सेनूह की कश्ती को तूफ़ानों से भी जो ले बचाबहर में जो हज़रत-ए-मूसा को दे दे रास्ताहो कुएँ की तह से तख़्त-ओ-ताज तक यूसुफ़ के साथपेट में मछली के यूनुस को रखे जो बा-हयातनर्म जो लोहे को कर दे हाथ में दाऊद केइब्न-ए-मरियम को बचा ले जो सलीब-ओ-दार सेमुस्तरद कर दे जो अहल-ए-हक़ पे हर यलग़ार कोनूर कर दे जिस्म-ए-इब्राहीम पर जो नार कोजो सिखा दे मानना फ़रमान हर मख़्लूक़ कोजो सुलैमाँ पर करे आसान हर मख़्लूक़ कोज़ालिमों को रोक दे जो पल में उन की टोह सेनाक़ा-ए-सालेह करे पैदा जो बत्न-ए-कोह सेअम्न का सुनवा दे जो मुज़्दा रसूलुल्लाह सेजो चमन सहरा को दे बनवा रसूलुल्लाह सेवक़्त जो मग़रिब का ठहरा दे रसूलुल्लाह सेचाँद दो टुकड़े जो करवा दे रसूलुल्लाह सेजिस ख़ुदा-ए-पाक की क़ुदरत के हों ये सब निशाँहम्द जिस की कर रही हों मछलियाँ और च्यूंटियाँजिस की 'अज़्मत की गवाही रोज़ दें शाम-ओ-सहरकर रहे हों चाँद सूरज हुक्म से जिस के सफ़रहर ज़बाँ-आवर जहाँ थक जाए जिस के ज़िक्र सेजिस की सतवत का बयाँ बाहर हो सब की फ़िक्र सेमशवरा तुम सब को इतना दे के अब मैं भी यहाँख़त्म करना चाहता हूँ ख़ुद पे ही अपना बयाँवसवसों के तुम मरज़ में मुब्तला होना नहींउस ख़ुदा से कुछ भी हो बे-आसरा होना नहीं
कोहसारों आबशारोंसुलगते सहराओंगहरे फैले समुंदरों मेंअब ऊँची इमारतोंक़हवा ख़ानों बारोंफिसलती कारों चमकती सड़कोंघड़ी के महदूद हिंदिसों मेंसिमट गया हैवो जिस की उँगली से चाँद शक़ होवो जिस के ज़ख़्मी दहन सेदुश्मन की फ़ौज पररहमतों की ठंडी फुवार बरसेवो जिस की मुट्ठी मेंवो जहाँ की तमाम दौलततमाम सर्वत सिमट गई होवो अपने ख़ाली शिकम में पत्थर का बोझ बाँधेकहाँ हैं इस के ग़ुलामआख़िर कहाँ हैं इस केवो निस्फ़ बाक़ी भी मिल चुका थाये निस्फ़ हासिल भी छिन चुका हैहुसूल कल सहल ही था लेकिनवो एक मंज़रफिसलती कारों चमकती सड़कों की हाव-हू मेंवो एक मंज़रग़ुलाम नाक़ा नशीन हो औरनकेल आक़ा के हाथ में होकहाँ से आए
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन केअश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैंना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाबबाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगीजब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे सेसब बुत उठवाए जाएँगेहम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरममसनद पे बिठाए जाएँगेसब ताज उछाले जाएँगेसब तख़्त गिराए जाएँगेबस नाम रहेगा अल्लाह काजो ग़ाएब भी है हाज़िर भीजो मंज़र भी है नाज़िर भीउट्ठेगा अनल-हक़ का नाराजो मैं भी हूँ और तुम भी हो
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
किसी के दूर जाने सेतअ'ल्लुक़ टूट जाने सेकिसी के मान जाने सेकिसी के रूठ जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को आज़माने सेकिसी के आज़माने सेकिसी को याद रखने सेकिसी को भूल जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को छोड़ देने सेकिसी के छोड़ जाने सेना शम्अ' को जलाने सेना शम्अ' को बुझाने सेमुझे अब डर नहीं लगताअकेले मुस्कुराने सेकभी आँसू बहाने सेना इस सारे ज़माने सेहक़ीक़त से फ़साने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी की ना-रसाई सेकिसी की पारसाई सेकिसी की बेवफ़ाई सेकिसी दुख इंतिहाई सेमुझे अब डर नहीं लगताना तो इस पार रहने सेना तो उस पार रहने सेना अपनी ज़िंदगानी सेना इक दिन मौत आने सेमुझे अब डर नहीं लगता
पहले भी तो गुज़रे हैंदौर ना-रसाई के ''बे-रिया'' ख़ुदाई केफिर भी ये समझते हो हेच आरज़ू-मंदीये शब-ए-ज़बाँ-बंदी है रह-ए-ख़ुदा-वंदीतुम मगर ये क्या जानोलब अगर नहीं हिलते हाथ जाग उठते हैंहाथ जाग उठते हैं राह का निशाँ बन करनूर की ज़बाँ बन करहाथ बोल उठते हैं सुब्ह की अज़ाँ बन कररौशनी से डरते होरौशनी तो तुम भी हो रौशनी तो हम भी हैंरौशनी से डरते होशहर की फ़सीलों परदेव का जो साया था पाक हो गया आख़िररात का लिबादा भीचाक हो गया आख़िर ख़ाक हो गया आख़िरइज़्दिहाम-ए-इंसाँ से फ़र्द की नवा आईज़ात की सदा आईराह-ए-शौक़ में जैसे राह-रौ का ख़ूँ लपकेइक नया जुनूँ लपकेआदमी छलक उट्ठेआदमी हँसे देखो शहर फिर बसे देखोतुम अभी से डरते हो?हाँ अभी तो तुम भी होहाँ अभी तो हम भी हैंतुम अभी से डरते हो
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहींतोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहींआज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलोदस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलोख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलोराह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलोहाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भीतीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भीसुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भीउन का दम-साज़ अपने सिवा कौन हैशहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन हैदस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहींलौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहींऔर कोई हम-नवा मिल जाए ये क़िस्मत नहींऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
सितारे जो दमकते हैंकिसी की चश्म-ए-हैराँ मेंमुलाक़ातें जो होती हैंजमाल-ए-अब्र-ओ-बाराँ मेंये ना-आबाद वक़्तों मेंदिल-ए-नाशाद में होगीमोहब्बत अब नहीं होगीये कुछ दिन बा'द में होगीगुज़र जाएँगे जब ये दिनये उन की याद में होगी
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया होशोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेराऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा होमरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरीदामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा होआज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँदुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया होलज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों मेंचश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा होगुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी कासाग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा होहो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौनाशरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा होमानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुलनन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा होसफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे होंनद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा होहो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारापानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता होआग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ाफिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा होपानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनीजैसे हसीन कोई आईना देखता होमेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन कोसुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा होरातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दमउम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया होबिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा देजब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ होपिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िनमैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा होकानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा होफूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू करानेरोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ होइस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नालेतारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा होहर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला देबेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
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