शेर आया शेर आया दौड़ना

सआदत हसन मंटो

शेर आया शेर आया दौड़ना

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    स्टोरीलाइन

    बचपन में स्कूल में पढ़ाई जानी वाली झूठे गड़रिये की कहानी को एक नए अंदाज़़ में प्रस्तुत किया गया है। कहानी में गड़रिये के शेर के न आने के बावजूद भी चिल्लाने के मक़सद को बताया गया है। गड़रिया शेर न होने के बावजूद भी चिल्लाता है क्योंकि वह चाहता है कि लोग शेर के आने से पहले ही ख़ुद को तैयार रखें। अगर अचानक से शेर आ गया तो किसी को भी बचाव का मौक़ा नहीं मिलेगा।

    ऊंचे टीले पर गडरिए का लड़का खड़ा, दूर घने जंगलों की तरफ़ मुँह किए चिल्ला रहा था, “शेर आया, शेर आया दौड़ना।” बहुत देर तक वो अपना गला फाड़ता रहा। उसकी जवाँ बलंद आवाज़ बहुत देर तक फ़िज़ाओं में गूंजती रही। जब चिल्ला चिल्ला कर उसका हलक़ सूख गया तो बस्ती से दो तीन बुढ्ढे लाठियां टेकते हुए आए और गडरिए के लड़के को कान से पकड़ कर ले गए।

    पंचायत बुलाई गई। बस्ती के सारे अ’क़्लमंद जमा हुए और गडरिए के लड़के का मुक़द्दमा शुरू हुआ। फ़र्द-ए-जुर्म ये थी कि उसने ग़लत ख़बर दी और बस्ती के अमन में ख़लल डाला।

    लड़के ने कहा, “मेरे बुज़र्ग़ो, तुम ग़लत समझते हो, शेर आया नहीं था लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि वो नहीं सकता?”

    जवाब मिला, “वो नहीं सकता।”

    लड़के ने पूछा, “क्यों?”

    जवाब मिला, “महकमा-ए-जंगलात के अफ़सर ने हमें चिट्ठी भेजी थी कि शेर बूढ्ढा हो चुका है।”

    लड़के ने कहा, “लेकिन आपको ये मालूम नहीं कि उसने थोड़े ही रोज़ हुए कायाकल्प कराया था।”

    जवाब मिला, “ये अफ़वाह थी। हमने महकमा-ए-जंगलात से पूछा था और हमें ये जवाब आया था कि कायाकल्प कराने की बजाय शेर ने तो अपने सारे दाँत निकलवा दिए हैं क्योंकि वो अपनी ज़िंदगी के बक़ाया दिन अहिंसा में गुज़ारना चाहता है।”

    लड़के ने बड़े जोश के साथ कहा, “मेरे बुज़र्ग़ो, क्या ये जवाब झूटा नहीं हो सकता।”

    सब ने ब-यक ज़बान हो कर कहा, “क़तअ’न नहीं। हमें महकमा-ए-जंगलात के अफ़सर पर पूरा भरोसा है। इसलिए कि वो सच बोलने का हलफ़ उठा चुका है।”

    लड़ने के पूछा, “क्या ये हलफ़ झूटा नहीं हो सकता?”

    जवाब मिला, “हर्गिज़ नहीं... तुम साज़िशी हो, फिफ्थ कालमिस्ट हो, कम्युनिस्ट हो, ग़द्दार हो, तरक़्क़ी पसंद हो... सआदत हसन मंटो हो।”

    लड़का मुस्कुराया, “ख़ुदा का शुक्र है कि मैं वो शेर नहीं जो आने वाला है... महकमा-ए-जंगलात का सच बोलने वाला अफ़सर नहीं, मैं...”

    पंचायत के एक बूढ़े आदमी ने लड़के की बात काट कर कहा, “तुम उसी गडरिए के लड़के की औलाद हो जिसकी कहानी साल-हा-साल से स्कूलों की इब्तिदाई जमा’तों में पढ़ाई जा रही है। तुम्हारा हश्र भी वही होगा जो उसका हुआ था... शेर आएगा तो तुम्हारी ही तिक्का बोटी उड़ा देगा।”

    गडरिए का लड़का मुस्कुराया, “मैं तो उससे लड़ूंगा। मुझे तो हर घड़ी उसके आने का खटका लगा रहता है। तुम क्यों नहीं समझते हो कि शेर आया, शेर आया वाली कहानी जो तुम अपने बच्चों को पढ़ाते हो आज की कहानी नहीं... आज की कहानी में तो शेर आया शेर आया का मतलब ये है कि ख़बरदार रहो, होशियार रहो। बहुत मुम्किन है शेर के बजाय कोई गीदड़ ही इधर चला आए मगर उस हैवान को भी तो रोकना चाहिए।”

    सब लोग खिलखिला कर हंस पड़े, “कितने डरपोक हो तुम... गीदड़ से डरते हो।”

    गडरिए के लड़के ने कहा, “मैं शेर और गीदड़ दोनों से नहीं डरता। लेकिन उनकी हैवानियत से अलबत्ता ज़रूर ख़ाइफ़ रहता हूँ और उस हैवानियत का मुक़ाबला करने के लिए ख़ुद को हमेशा तैयार रखता हूँ। मेरे बुज़र्ग़ो, स्कूलों में से वो किताब उठा लो जिसमें शेर आया, शेर आया वाली पुरानी कहानी छपी है, उसकी जगह ये नई कहानी पढ़ाओ।”

    एक बुड्ढे ने खांसते खंकारते हुए कहा, “ये लौंडा हमें गुमराह करना चाहता है। ये हमें राह-ए-मुस्तक़ीम से हटाना चाहता है।”

    लड़के ने मुस्कुरा कर कहा, “ज़िंदगी ख़त-ए-मुस्तक़ीम नहीं है मेरे बुज़र्ग़ो।”

    दूसरे बूढ़े ने फर्त-ए-जज़्बात से लरज़ते हुए कहा, “ये मुल्हिद है। ये बेदीन है, फ़ित्ना परदाज़ों का एजेंट है। इसको फ़ौरन ज़िन्दां में डाल दो।”

    गडरिए के लड़के को ज़िन्दां में डाल दिया गया।

    उसी रात बस्ती में शेर दाख़िल हुआ, भगदड़ मच गई। कुछ बस्ती छोड़ कर भाग गए। बाक़ी शेर ने शिकार कर लिये। मूंछों के साथ ख़ून चूसता जब शेर ज़िन्दां के पास से गुज़रा तो उसने मज़बूत आहनी सलाखों के पीछे गडरिए के लड़के को देखा और दाँत पीस कर रह गया।

    गडरिए का लड़का मुस्कुराया, “दोस्त, ये मेरे बुज़ुर्गों की ग़लती है, वर्ना तुम मेरे लहू का ज़ायक़ा भी चख लेते।”

    स्रोत :
    • पुस्तक : نمرودکی خدائی

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