मंज़िल शायरी

मंज़िल की तलाश-ओ-जुस्तुजू और मंज़िल को पा लेने की ख़्वाहिश एक बुनियादी इन्सानी ख़्वाहिश है। उसी की तकमील में इन्सान एक मुसलसल और कड़े सफ़र में सरगर्दां है लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि मिल जाने वाली मंज़िल भी आख़िरी मंज़िल नहीं होती। एक मंज़िल के बाद नई मंज़िल तक पहुँचने की आरज़ू और एक नए सफ़र का आग़ाज़ हो जाता है। मंज़िल और सफ़र के हवाले से और बहुत सारी हैरान कर देने वाली सूरतें हमारे इस इन्तिख़ाब में मौजूद हैं।