फ़िल्मी शेर पर चित्र/छाया शायरी

यहाँ हमने जो अशआर जमा

किए है उन का इस्तेमाल फ़िल्मों में हुआ है और इसी वजह से इन में से बेश्तर अशआर ज़बान-ए-ज़द ख़ास-ओ-आम है और हमारी ज़िंदगी के रोज़-मर्रा के मुआमलात को घेरते हैं। उम्मीद है आप को ये इन्तिख़ाब पसंद आएगा।

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन

सुब्ह होती है शाम होती है

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें

कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी

सुब्ह होती है शाम होती है

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द

हम हैं राही प्यार के हम से कुछ न बोलिए

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी

आवारा

कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ

किसी की याद में दुनिया को हैं भुलाए हुए

आज जाने की ज़िद न करो

आवारा

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी

बोलिए