ग़ालिब का इस्तिआरा (रूपक) और आधुनिक शायरी का इबहाम (अस्पष्टता)
ग़ालिब की मुश्किल-पसंदी सिर्फ़ शब्दों का गोरखधंधा नहीं थी, बल्कि उनका पेचीदा इस्तिआरा (रूपक) और शब्द व अर्थ का मिलन आधुनिक उर्दू शायरी की बुनियादी संरचना बना।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
किस ने नहीं किया। न सिर्फ हिन्दुस्तानी अदबियात बल्कि आलमी अदब में ग़ालिब की अज़्मत और इस के शेरी मर्तबे को तस्लीम किया गया है। ग़ालिब के हम-अस्र और उनके बाद के शायरों ने भी उनको उनक उस्तादी का ख़िराज पेश किया है। ऐसे बहुत से शेर हैं जिनमें ग़ालिब के फ़न्नी-ओ-तख़्लीक़ी कमाल के तज़किरे मिलते हैं। हम एक छोटा सा इन्तिख़ाब पेश कर रहे हैं।
ग़ालिब की मुश्किल-पसंदी सिर्फ़ शब्दों का गोरखधंधा नहीं थी, बल्कि उनका पेचीदा इस्तिआरा (रूपक) और शब्द व अर्थ का मिलन आधुनिक उर्दू शायरी की बुनियादी संरचना बना।
इस मज़मून (लेख) में जायज़ा लिया गया है कि किस तरह मौलाना हाली ने 'मुक़द्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी' के ज़रिए रिवायती (पारंपरिक) ग़ज़ल को ख़ारिज किया, लेकिन अपने तनक़ीदी विचारों को इस तरह पेश किया कि उनके उस्ताद मिर्ज़ा ग़ालिब की अज़मत (महानता) पर कोई आंच न आए।
ग़ालिब की शायरी को आमतौर पर 'मुश्किल' कहा जाता है, लेकिन आलोचनात्मक नज़र से देखें तो यह इश्काल (कठिनाई) नहीं बल्कि 'इबहाम' (अस्पष्टता) है, जो शेर की कमी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी है।
वक़्त के साथ ज़ौक़ (पसंद) बदलता है, लेकिन क्लासिकी विषयों को महज़ सामाजिक दबाव या आधुनिकता के आधार पर ख़ारिज करना एक ग़ैर-आलोचनात्मक रवैया है।
यह मज़मून (लेख) इस हक़ीक़त पर बहस करता है कि एक महान शायर अपने पीछे नक़्ल करने वालों का कोई स्कूल नहीं छोड़ता, बल्कि उसके फ़ौरन बाद आने वाले शायर जाने-अनजाने में उसके अंदाज़ (शैली) से अलग राह अपनाते हैं।
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की नज़र में मीर और ग़ालिब दोनों उर्दू ग़ज़ल के रिवायती आशिक़ से इंहिराफ़ (परंपरा से अलग हटना) करते हैं, लेकिन मीर का आशिक़ एक जीता-जागता इंसान है जबकि ग़ालिब का आशिक़ एक अमूर्त (abstract) और आदर्श रूप है।