बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है
कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से
क़ैद-ए-आवारगी-ए-जाँ ही बहुत है मुझ को
एक दीवार मिरी रूह के अंदर न बना
हमारी रूह परिंदों को सौंप दी जाए
कि ये बदन तो गुनहगार हो गए साहिब
'अमल तेरा भी साकित है तलब मेरी भी नाक़िस है
कि अब रूह-ए-मोहब्बत से हुए दोनों के दिल ख़ाली