ये चाँद सा चेहरा है कि सूरज की किरन है
ज़ुल्फ़ें हैं तिरी रात सुहानी है कि क्या है
उफ़ुक़ पे यादों के ज़र्द आँचल में लिपटा सूरज
और उस पे शामों के साथ ढलती 'अजीब सी चुप
आप के शहर में सूरज तो निकलने से रहा
एक मशअ'ल ही मिरे हात में रहने दीजे
सूरज लहूलुहान समुंदर में गिर पड़ा
दिन का ग़ुरूर टूट गया शाम हो गई
आओ अब अपने ध्यान का सूरज उगाएँ हम
है मय-कदे में शोर बपा शाम हो गई
सियाह रातों में हर शय डुबो चुका हूँ मगर
वो एक दर्द का सूरज कि डूबता भी नहीं
ये ताक़चों में रखे सब चराग़ सूरज हैं
अगर वो चाँद सा चेहरा हमारा हो जाए