अज़रा परवीन
ग़ज़ल 8
नज़्म 5
अशआर 5
चार सम्तें आईना सी हर तरफ़
तुम को खो देने का मंज़र और मैं
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चार सम्तें आईना सी हर तरफ़
तुम को खो देने का मंज़र और मैं
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ज़मीं के और तक़ाज़े फ़लक कुछ और कहे
क़लम भी चुप है कि अब मोड़ ले कहानी क्या
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ज़मीं के और तक़ाज़े फ़लक कुछ और कहे
क़लम भी चुप है कि अब मोड़ ले कहानी क्या
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उस ने मेरे नाम सूरज चाँद तारे लिख दिया
मेरा दिल मिट्टी पे रख अपने लब रोता रहा
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