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दाग़ देहलवी

1831 - 1905 | दिल्ली, भारत

उर्दू के सबसे लोकप्रिय शायरों में शामिल। शायरी में चुस्ती , शोख़ी और मुहावरों के इस्तेमाल के लिए प्रसिद्ध

उर्दू के सबसे लोकप्रिय शायरों में शामिल। शायरी में चुस्ती , शोख़ी और मुहावरों के इस्तेमाल के लिए प्रसिद्ध

दाग़ देहलवी

ग़ज़ल 181

अशआर 195

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।

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हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'

जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर एक मज़ेदार विरोधाभास रखता है: प्रेम में कई तरह की मीठी व्यस्तताएँ हैं, फिर भी सबसे बड़ा कमाल “कुछ करना” है। “कुछ करना” का मतलब है बिना ज़ोर लगाए, धैर्य से, भीतर ही भीतर प्रेम में डूबे रहना। भाव यह है कि सच्ची लगन कई बार चुपचाप ठहरने में दिखती है।

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वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर पुराने वादों को सामने रखकर आज की बेरुख़ी पर सवाल करता है। पहली पंक्ति में साथ निभाने और बात मानने की कसमें हैं, और दूसरी में तंज भरा याद दिलाना। भाव यह है कि जो वचन दिए गए थे, वही अब टूटते दिख रहे हैं, इसलिए याद को गवाही बनाया गया है।

मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है

मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है

Interpretation: Rekhta AI

कवि का दर्द यह है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से नज़दीक आता है, उसी को अपमानित करके कुचल दिया जाता है। “मिट्टी में मिलाना” यहाँ बेइज़्ज़ती और बरबादी का संकेत है। दूसरी पंक्ति बताती है कि ऐसा सच्चा चाहने वाला वैसे ही बहुत कम मिलता है, इसलिए उसकी कदर करना बड़ा नुकसान है। भाव में शिकायत और पछतावा दोनों हैं।

नहीं खेल 'दाग़' यारों से कह दो

कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते

Interpretation: Rekhta AI

शेर में दाग़ देहलवी समझाते हैं कि उर्दू की नज़ाकत और खूबसूरती हासिल करना आसान नहीं। “आते आते” से संकेत मिलता है कि भाषा पर पकड़ समय, अभ्यास और धैर्य से बनती है। इसमें दोस्तों को सावधान करने के साथ अपने हुनर की क़द्र का भाव भी है कि असली निपुणता देर से आती है।

क़ितआ 2

 

क़िस्सा 5

 

नअत 1

 

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चित्र शायरी 36

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ताहिरा सैयद

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