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दाग़ देहलवी

1831 - 1905 | दिल्ली, भारत

उर्दू के सबसे लोकप्रिय शायरों में शामिल। शायरी में चुस्ती , शोख़ी और मुहावरों के इस्तेमाल के लिए प्रसिद्ध

उर्दू के सबसे लोकप्रिय शायरों में शामिल। शायरी में चुस्ती , शोख़ी और मुहावरों के इस्तेमाल के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 79

शेर 179

क्या बैठना क्या उठना क्या बोलना क्या हँसना

हर आन में काफ़िर की इक आन निकलती है

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निगह निकली दिल की चोर ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं निकली

इधर ला हाथ मुट्ठी खोल ये चोरी यहीं निकली

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फिरता है मेरे दिल में कोई हर्फ़-ए-मुद्दआ

क़ासिद से कह दो और जाए ज़रा सी देर

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लतीफ़े 5

ई-पुस्तक 68

Aaftab-e-Dagh

 

1923

Aftaab-e-Dagh

 

1906

आफ़ताब-ए-दाग़

दीवान-ए-दाेम

1959

आफ़ताब-ए-दाग़

खण्ड-002

1959

आफ़ताब-ए-दाग़

 

1906

Ameer-o-Dagh Ke Kalam Ka Intikhab

 

1943

Ameer-o-Dagh Ki Nazuk Khayaliyan

 

 

Bahar-e-Dagh

 

1940

दाग़

 

1960

दाग़ देहलवी

हयात और कारनामे

1997

चित्र शायरी 24

दिल परेशान हुआ जाता है
और सामान हुआ जाता है

ख़िदमत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ कर ज़ाहिद
तू अब इंसान हुआ जाता है

मौत से पहले मुझे क़त्ल करो
उस का एहसान हुआ जाता है

लज़्ज़त-ए-इश्क़ इलाही मिट जाए
दर्द अरमान हुआ जाता है

दम ज़रा लो कि मिरा दम तुम पर
अभी क़ुर्बान हुआ जाता है

गिर्या क्या ज़ब्त करूँ ऐ नासेह
अश्क पैमान हुआ जाता है

बेवफ़ाई से भी रफ़्ता रफ़्ता
वो मिरी जान हुआ जाता है

अर्सा-ए-हश्र में वो आ पहुँचे
साफ़ मैदान हुआ जाता है

मदद ऐ हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
काम आसान हुआ जाता है

छाई जाती है ये वहशत कैसी
घर बयाबान हुआ जाता है

शिकवा सुन आँख मिला कर ज़ालिम
क्यूँ पशेमान हुआ जाता है

आतिश-ए-शौक़ बुझी जाती है
ख़ाक अरमान हुआ जाता है

उज़्र जाने में न कर ऐ क़ासिद
तू भी नादान हुआ जाता है

मुज़्तरिब क्यूँ न हों अरमाँ दिल में
क़ैद मेहमान हुआ जाता है

'दाग़' ख़ामोश न लग जाए नज़र
शे'र दीवान हुआ जाता है

दिल परेशान हुआ जाता है और सामान हुआ जाता है ख़िदमत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ कर ज़ाहिद तू अब इंसान हुआ जाता है मौत से पहले मुझे क़त्ल करो उस का एहसान हुआ जाता है लज़्ज़त-ए-इश्क़ इलाही मिट जाए दर्द अरमान हुआ जाता है दम ज़रा लो कि मिरा दम तुम पर अभी क़ुर्बान हुआ जाता है गिर्या क्या ज़ब्त करूँ ऐ नासेह अश्क पैमान हुआ जाता है बेवफ़ाई से भी रफ़्ता रफ़्ता वो मिरी जान हुआ जाता है अर्सा-ए-हश्र में वो आ पहुँचे साफ़ मैदान हुआ जाता है मदद ऐ हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद काम आसान हुआ जाता है छाई जाती है ये वहशत कैसी घर बयाबान हुआ जाता है शिकवा सुन आँख मिला कर ज़ालिम क्यूँ पशेमान हुआ जाता है आतिश-ए-शौक़ बुझी जाती है ख़ाक अरमान हुआ जाता है उज़्र जाने में न कर ऐ क़ासिद तू भी नादान हुआ जाता है मुज़्तरिब क्यूँ न हों अरमाँ दिल में क़ैद मेहमान हुआ जाता है 'दाग़' ख़ामोश न लग जाए नज़र शे'र दीवान हुआ जाता है

अभी हमारी मोहब्बत किसी को क्या मालूम
किसी के दिल की हक़ीक़त किसी को क्या मालूम

यक़ीं तो ये है वो ख़त का जवाब लिक्खेंगे
मगर नविश्ता-ए-क़िस्मत किसी को क्या मालूम

ब-ज़ाहिर उन को हया-दार लोग समझे हैं
हया में जो है शरारत किसी को क्या मालूम

क़दम क़दम पे तुम्हारे हमारे दिल की तरह
बसी हुई है क़यामत किसी को क्या मालूम

ये रंज ओ ऐश हुए हिज्र ओ वस्ल में हम को
कहाँ है दोज़ख़ ओ जन्नत किसी को क्या मालूम

जो सख़्त बात सुने दिल तो टूट जाता है
इस आईने की नज़ाकत किसी को क्या मालूम

किया करें वो सुनाने को प्यार की बातें
उन्हें है मुझ से अदावत किसी को क्या मालूम

ख़ुदा करे न फँसे दाम-ए-इश्क़ में कोई
उठाई है जो मुसीबत किसी को क्या मालूम

अभी तो फ़ित्ने ही बरपा किए हैं आलम में
उठाएँगे वो क़यामत किसी को क्या मालूम

जनाब-ए-'दाग़' के मशरब को हम से तो पूछो
छुपे हुए हैं ये हज़रत किसी को क्या मालूम

अभी हमारी मोहब्बत किसी को क्या मालूम किसी के दिल की हक़ीक़त किसी को क्या मालूम यक़ीं तो ये है वो ख़त का जवाब लिक्खेंगे मगर नविश्ता-ए-क़िस्मत किसी को क्या मालूम ब-ज़ाहिर उन को हया-दार लोग समझे हैं हया में जो है शरारत किसी को क्या मालूम क़दम क़दम पे तुम्हारे हमारे दिल की तरह बसी हुई है क़यामत किसी को क्या मालूम ये रंज ओ ऐश हुए हिज्र ओ वस्ल में हम को कहाँ है दोज़ख़ ओ जन्नत किसी को क्या मालूम जो सख़्त बात सुने दिल तो टूट जाता है इस आईने की नज़ाकत किसी को क्या मालूम किया करें वो सुनाने को प्यार की बातें उन्हें है मुझ से अदावत किसी को क्या मालूम ख़ुदा करे न फँसे दाम-ए-इश्क़ में कोई उठाई है जो मुसीबत किसी को क्या मालूम अभी तो फ़ित्ने ही बरपा किए हैं आलम में उठाएँगे वो क़यामत किसी को क्या मालूम जनाब-ए-'दाग़' के मशरब को हम से तो पूछो छुपे हुए हैं ये हज़रत किसी को क्या मालूम

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