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मीर तक़ी मीर

1723 - 1810 | दिल्ली, भारत

उर्दू के पहले बड़े शायर जिन्हें 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है

उर्दू के पहले बड़े शायर जिन्हें 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है

मीर तक़ी मीर

ग़ज़ल 343

नज़्म 1

 

अशआर 255

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए

पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय के होंठों की कोमल सुंदरता पर मुग्ध है और मानता है कि उसे शब्दों में कहना पूरा नहीं हो पाता। गुलाब की पंखुड़ी की उपमा नर्मी, ताज़गी और नाज़ुकपन का भाव जगाती है। प्रश्नवाचक ढंग प्रशंसा को बढ़ाता है और उस सौंदर्य को अनोखा बताता है।

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या

आगे आगे देखिए होता है क्या

Interpretation: Rekhta AI

मीर तक़ी मीर प्रेम को एक लंबी और कठिन यात्रा मानते हैं, जहाँ शुरुआत में ही रो पड़ना जल्दबाज़ी है। वक्ता धैर्य रखने को कहता है और संकेत देता है कि आगे और बड़ी कसौटियाँ सकती हैं। भाव यह है कि प्रेम का असली दर्द और सच आगे बढ़ने पर ही खुलता है।

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है

जाने जाने गुल ही जाने बाग़ तो सारा जाने है

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ वक्ता का दर्द इतना साफ़ है कि प्रकृति की हर चीज़ उसकी तड़प की गवाह बन जाती है। लेकिन “फूल” यानी प्रिय/जिससे उम्मीद है, वही अनजान या बेपरवाह रहता है। बाग़ का सब कुछ जानना और फूल का जानना—यही विरह, चाह और उदासीनता की चोट को तीखा कर देता है।

कोई तुम सा भी काश तुम को मिले

मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ ‘इंतिक़ाम’ का मतलब चोट पहुँचाना नहीं, बल्कि व्यंग्य भरी कामना है कि प्रिय को अपना ही जैसा व्यवहार कहीं से वापस मिले। जब वह वही बेरुख़ी और ठेस झेलेगा, तब उसे अपनी बातों और रवैये का असर समझ आएगा। भावनात्मक केंद्र घायल प्रेम है, जो समझ दिलाने के लिए आईने जैसा बदला चाहता है।

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अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'

फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर विदाई और मिलने की अनिश्चितता का भाव रखता है। प्रेमी प्रिय के ठिकाने को “बुत-कदा” कहकर उसे पूजा-सा मान देता है, पर साथ ही वहाँ से दूर जाना पड़ रहा है। “अगर ख़ुदा लाया” में उम्मीद भी है और यह बात भी कि फिर मिलना अपने बस में नहीं, किस्मत/ईश्वर की मरज़ी पर है।

मर्सिया 34

क़ितआ 27

रुबाई 104

कुल्लियात 1896

पुस्तकें 135

चित्र शायरी 31

वीडियो 47

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ऑडियो 47

आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ

इश्क़ में ने ख़ौफ़-ओ-ख़तर चाहिए

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया

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