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नज़ीर अकबराबादी

1735 - 1830 | आगरा, भारत

मीर तक़ी ' मीर ' के समकालीन अग्रणी शायर जिन्होंने भारतीय संस्कृति और त्योहारों पर नज्में लिखीं। होली , दीवाली , श्रीकृष्ण पर नज़्मों के लिए मशहूर

मीर तक़ी ' मीर ' के समकालीन अग्रणी शायर जिन्होंने भारतीय संस्कृति और त्योहारों पर नज्में लिखीं। होली , दीवाली , श्रीकृष्ण पर नज़्मों के लिए मशहूर

ग़ज़ल 214

नज़्म 22

शेर 104

जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब हो

ये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब हो

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था इरादा तिरी फ़रियाद करें हाकिम से

वो भी एे शोख़ तिरा चाहने वाला निकला

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मय पी के जो गिरता है तो लेते हैं उसे थाम

नज़रों से गिरा जो उसे फिर किस ने सँभाला

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रुबाई 22

पुस्तकें 52

अशआर-ए-नज़ीर

 

1940

Bachon Ke Nazeer

 

1959

Deewan-e-Nazeer

 

 

Deewan-e-Nazeer Akbarabadi

 

1942

Farhang-e-Nazeer

 

1991

इन्तिख़ाब नज़ीर अकबर आबादी

 

2001

Intikhab-e-Ghazliyat-e-Nazeer Akbarabadi

 

1994

Intikhab-e-Manzumat Nazeer Akbarabadi

 

1988

इंतिख़ाब-ए-नज़ीर

 

2003

Intikhab-e-Nazeer

 

1990

चित्र शायरी 2

था इरादा तिरी फ़रियाद करें हाकिम से वो भी एे शोख़ तिरा चाहने वाला निकला

 

वीडियो 21

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"Bahr-e-Taweel"

Zia Mohiuddin reads "Bahr-e-Taweel" nazeer akbarabadi ka likha hua ek sher hai jo be-inteha lamba hai. Ziya sahib ki khubsurat aawaaz mein us ka lutf dugna ho jaata hai. ज़िया मोहीउद्दीन

Ahl-e-Duniya

Diwali Nazm

अज्ञात

Khoon rez karishma naaz sitam

छाया गांगुली

Khoonrez Karishma Naaz Sitam

छाया गांगुली

आदमी-नामा

दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमी हबीब तनवीर

आदमी-नामा

दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमी

आदमी-नामा

दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमी मोहम्मद रफ़ी

आदमी-नामा

दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमी मेहदी ज़हीर

तन पर उस के सीम फ़िदा और मुँह पर मह दीवाना है

सयान चौधरी

दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम

निर्मला देवी

दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम

नज़ीर अकबराबादी

दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम

मोहम्मद रफ़ी

बंजारा-नामा

टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे मारा मुकेश

बंजारा-नामा

टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे मारा मेहदी ज़हीर

बंजारा-नामा

टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे मारा अज्ञात

बंजारा-नामा

टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे मारा अज्ञात

रोटियाँ

जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ जसविंदर सिंह

हम अश्क-ए-ग़म हैं अगर थम रहे रहे न रहे

इक़बाल बानो

होली

आ धमके ऐश ओ तरब क्या क्या जब हुस्न दिखाया होली ने अज्ञात

होली की बहारें

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की छाया गांगुली

ऑडियो 8

उस के शरार-ए-हुस्न ने शो'ला जो इक दिखा दिया

न मैं दिल को अब हर मकाँ बेचता हूँ

नज़र पड़ा इक बुत-ए-परी-वश निराली सज-धज नई अदा का

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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