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आग़ा अकबराबादी

- 1879

प्रतिष्ठित क्लासिकी शायर, ग़ज़लों में अपारंपरिक प्रेम और रोमांस के लिए मशहूर, दाग़ के समकालीन

प्रतिष्ठित क्लासिकी शायर, ग़ज़लों में अपारंपरिक प्रेम और रोमांस के लिए मशहूर, दाग़ के समकालीन

आग़ा अकबराबादी

ग़ज़ल 24

शेर 28

हमें तो उन की मोहब्बत है कोई कुछ समझे

हमारे साथ मोहब्बत उन्हें नहीं तो नहीं

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रक़ीब क़त्ल हुआ उस की तेग़-ए-अबरू से

हराम-ज़ादा था अच्छा हुआ हलाल हुआ

सनम-परस्ती करूँ तर्क क्यूँकर वाइ'ज़

बुतों का ज़िक्र ख़ुदा की किताब में देखा

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किसी को कोसते क्यूँ हो दुआ अपने लिए माँगो

तुम्हारा फ़ाएदा क्या है जो दुश्मन का ज़रर होगा

हाथ दोनों मिरी गर्दन में हमाइल कीजे

और ग़ैरों को दिखा दीजे अँगूठा अपना

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चित्र शायरी 1

हमें तो उन की मोहब्बत है कोई कुछ समझे हमारे साथ मोहब्बत उन्हें नहीं तो नहीं