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अब्दुल हमीद

1953 | इलाहाबाद, भारत

ग़ज़ल 12

शेर 12

फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं

हवा कहती है मुझ से ये तमाशा कैसा लगता है

लौट गए सब सोच के घर में कोई नहीं है

और ये हम कि अंधेरा कर के बैठ गए हैं

दिन गुज़रते हैं गुज़रते ही चले जाते हैं

एक लम्हा जो किसी तरह गुज़रता ही नहीं

ऑडियो 12

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं

अजीब शय है कि सूरत बदलती जाती है

उसे देख कर अपना महबूब प्यारा बहुत याद आया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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