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अब्दुल मन्नान समदी

1988 | अलीगढ़, भारत

नई नस्ल के शायरों और फ़िक्शन लिखने वालों में शामिल, नज़्म और ग़ज़ल दोनों अस्नाफ़ में मस्रूफ़-ए-सुख़न

नई नस्ल के शायरों और फ़िक्शन लिखने वालों में शामिल, नज़्म और ग़ज़ल दोनों अस्नाफ़ में मस्रूफ़-ए-सुख़न

अब्दुल मन्नान समदी

ग़ज़ल 18

नज़्म 9

अशआर 7

परिंदे सब नहीं ज़िंदान में मारे गए हैं

क़फ़स में कुछ तो कुछ नक़्ल-ए-मकानी में मरे हैं

उलट कर जब भी देखी है किताब-ए-ज़िंदगी हम ने

तो हर इक लफ़्ज़ के पीछे कोई इक हादिसा निकला

बदन पर इस-क़दर बारिश मिरे होती है बोसों की

कि जब बाँहें तिरी मुझ पर खुली हों डालियाँ बन कर

वही रुस्वाई का मेरी सबब आख़िर बने मौला

वही जो लोग कल शामें सुहानी करने वाले थे

तसव्वुर की हदों से दूर जा कर कैसे देखेंगे

अगर तुम से तअ'ल्लुक़ ग़ाएबाना भी नहीं होगा

वीडियो 4

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

अब्दुल मन्नान समदी

अब्दुल मन्नान समदी

अब्दुल मन्नान समदी

अब्दुल मन्नान समदी

अब्दुल मन्नान समदी

अब्दुल मन्नान समदी

इस क़दर मशग़ूल थे इक रू-ए-ताबाँ की तरफ़

अब्दुल मन्नान समदी

कैसे रुक सकता था जो कार-ए-ज़ियाँ होने को था

अब्दुल मन्नान समदी

फ़स्ल-ए-गुल ऐसी न थी बाद-ए-सबा ऐसी न थी

अब्दुल मन्नान समदी

रवय्या काफ़ी कुछ बदला हुआ है आसमानों का

अब्दुल मन्नान समदी

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