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अब्दुर्राहमान वासिफ़

1980 - | कहूटा, पाकिस्तान

ग़ज़ल 10

शेर 10

मिरा तुम्हारा तअल्लुक़ बिगड़ के बन गया है

मिरे तुम्हारे ख़यालात का अमीं कोई है

सो यूँ हुआ कि लगा क़ुफ़्ल नुत्क़-ओ-लब पे मिरे

मैं तुम से मिल के बहुत देर तक रहा ख़ामोश

इक इंतिज़ार में क़ाएम है इस चराग़ की लौ

इक एहतिमाम में कमरे का दर खुला हुआ है

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