अफ़क़र मोहानी
ग़ज़ल 44
नज़्म 1
अशआर 10
पहुँची है ख़ाक-ए-आशिक़-ए-बर्बाद अर्श पर
ऊँचा अगर ग़ुबार हुआ है कभी कभी
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सीख ले हम से जबीं-साई-ए-का'बा ज़ाहिद
हम को आता है दर-ए-यार पे सज्दा करना
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इसे पीते हैं आँखें बंद करके बादा कश ज़ाहिद
निगाहों से ये शीशे की परी देखी नहीं जाती
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वादा-ए-बे-वफ़ा वफ़ा न हुआ
मुझ को इस ए'तिबार ने मारा
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