अफ़रोज़ रिज़वी
ग़ज़ल 21
नज़्म 2
अशआर 2
छेड़ा है एक नग़्मा-ए-शीरीं भी कू-ब-कू
दिल ने हिलाल-ए-ईद की ताईद के लिए
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छेड़ा है एक नग़्मा-ए-शीरीं भी कू-ब-कू
दिल ने हिलाल-ए-ईद की ताईद के लिए
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वो महकता है जो ख़ुश्बू के हवालों की तरह
इस को रक्खा है किताबों में गुलाबों की तरह
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वो महकता है जो ख़ुश्बू के हवालों की तरह
इस को रक्खा है किताबों में गुलाबों की तरह
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