अहमद कमाल परवाज़ी
ग़ज़ल 20
अशआर 19
मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब
देर से चाँद निकलना भी ग़लत लगता है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
तुझ से बिछड़ूँ तो तिरी ज़ात का हिस्सा हो जाऊँ
जिस से मरता हूँ उसी ज़हर से अच्छा हो जाऊँ
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
तुम मिरे साथ हो ये सच तो नहीं है लेकिन
मैं अगर झूट न बोलूँ तो अकेला हो जाऊँ
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
इस क़दर आप के बदले हुए तेवर हैं कि मैं
अपनी ही चीज़ उठाते हुए डर जाता हूँ
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
मैं इस लिए भी तिरे फ़न की क़द्र करता हूँ
तू झूट बोल के आँसू निकाल लेता है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए