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अहमद ख़याल

1979

ग़ज़ल 27

शेर 19

ये भी एजाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी

उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था

महकते फूल सितारे दमकता चाँद धनक

तिरे जमाल से कितनों ने इस्तिफ़ादा क्या

ये भी तिरी शिकस्त नहीं है तो और क्या

जैसा तू चाहता था मैं वैसा नहीं बना

कोई हैरत है इस बात का रोना है हमें

ख़ाक से उट्ठे हैं सो ख़ाक ही होना है हमें

ऐन मुमकिन है कि बीनाई मुझे धोका दे

ये जो शबनम है शरारा भी तो हो सकता है