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अहमद नदीम क़ासमी

1916 - 2006 | लाहौर, पाकिस्तान

पाकिस्तान के शीर्ष प्रगतिशील शायर/कहानीकारों में भी महत्वपूर्ण स्थान/सआदत हसन मंटो के समकालीन

ग़ज़ल

जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी

अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था

अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या

अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की

एजाज़ है ये तेरी परेशाँ-नज़री का

क़लम दिल में डुबोया जा रहा है

खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए

गो मिरे दिल के ज़ख़्म ज़ाती हैं

जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी

जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम

जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ

तू जो बदला तो ज़माना भी बदल जाएगा

तेरी महफ़िल भी मुदावा नहीं तन्हाई का

दावा तो किया हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ का सब ने

फ़ासले के मअ'नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो

फिर भयानक तीरगी में आ गए

मुदावा हब्स का होने लगा आहिस्ता आहिस्ता

लब-ए-ख़ामोश से इफ़्शा होगा

शाम को सुब्ह-ए-चमन याद आई

सूरज को निकलना है सो निकलेगा दोबारा

हम दिन के पयामी हैं मगर कुश्ता-ए-शब हैं

हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है

होता नहीं ज़ौक़-ए-ज़िंदगी कम

अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था

नज़्म

इंफ़िसाल

एक दरख़्वास्त

क़यामत

क़रिया-ए-मोहब्बत

गुनाह ओ सवाब

जंगल की आग

ढलान

पत्थर

पाबंदी

लरज़ते साए

वक़्त

सफ़र और हम-सफ़र

पत्थर

शेर

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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