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अख़लाक़ बन्दवी

1964 | जौनपुर, भारत

ग़ज़ल 11

शेर 4

किसी के लम्स की तासीर है कि बरसों बा'द

मिरी किताबों में अब भी गुलाब जागते हैं

क्या तुझे इल्म नहीं तेरी रज़ा की ख़ातिर

मैं ने किस किस को ज़माने में ख़फ़ा रक्खा है

ज़माने से मोहब्बत का अभी तक

ये हासिल है कि कुछ हासिल नहीं है

पुस्तकें 1

Lams

 

2017

 

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