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अख़्तर ज़ियाई

1933 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम

ग़ज़ल 19

नज़्म 3

 

शेर 4

कोई इलाज-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी बता वाइज़

सुने हुए जो फ़साने हैं फिर सुना मुझे

आस डूबी तो दिल हुआ रौशन

बुझ गया दिल तो दिल के दाग़ जले

दफ़अतन आँधियों ने रुख़ बदला

ना-गहाँ आरज़ू के बाग़ जले

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