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अली सरदार जाफ़री

1913 - 2000 | मुंबई, भारत

अग्रणी प्रगतिशील शायरों में शामिल/आलोचक, बुद्धिजीवी और साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ़्तुगू’ के संपादक/भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित/उर्दू शायरों पर टीवी सीरियलों के निर्माता

ग़ज़ल

अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ ग़ुल होती जाती है

काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा

शिकस्त-ए-शौक़ को तकमील-ए-आरज़ू कहिए

नज़्म

प्यास भी एक समंदर है

मेरा सफ़र

शुऊर

गुफ़्तुगू (हिन्द पाक दोस्ती के नाम)

चाँद को रुख़्सत कर दो

तुम नहीं आए थे जब

दो चराग़

निवाला

बहुत क़रीब हो तुम

मेरा सफ़र

चाँद को रुख़्सत कर दो

निवाला

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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