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अलीमुल्लाह हाली

1941 | पटना, भारत

अलीमुल्लाह हाली

ग़ज़ल 9

शेर 4

एक आवाज़ ने तोड़ी है ख़मोशी मेरी

ढूँढता हूँ तो पस-ए-साहिल-ए-शब कुछ भी नहीं

कोई पत्थर का निशाँ रख के जुदा हों हम तुम

जाने ये पेड़ किस आँधी में उखड़ जाएगा

सदाओं के जंगल में वो ख़ामुशी है

कि मैं ने हर आवाज़ तेरी सुनी है

बिखर के छूट जाऊँ तिरी गिरफ़्त से मैं

सँभाल कर मुझे मौज-ए-ख़ुश-अदा ले जा

बच्चों की कहानी 1

 

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