अमर अबदाबादी
ग़ज़ल 20
अशआर 15
छुपा कर दिल में ले जाएँगे जो जो दिल पे गुज़री है
हम इस ना-क़द्र दुनिया को ये अफ़्साने नहीं देंगे
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कहाँ की 'आशिक़ी कैसी मोहब्बत दिल का आना क्या
हवस का नाम मिल कर रख लिया है 'आशिक़ी हम ने
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तुम्हारी बज़्म में हर दो तरफ़ थी एक मजबूरी
न तुम ने मद-भरी आँखें उठाईं और न पी हम ने
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बता ऐ शम' किस ग़म में जलेगी
अगर जाँ तुझ पे परवाने न देंगे
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मलेंगे आप भी दस्त-ए-तअस्सुफ़
अगर हम को सुकूँ पाने न देंगे
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