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आमिर उस्मानी

1920 - 1975

प्रमुख गद्यकार, व्यंग्यकार और शायर

प्रमुख गद्यकार, व्यंग्यकार और शायर

ग़ज़ल 8

नज़्म 3

 

शेर 13

आबलों का शिकवा क्या ठोकरों का ग़म कैसा

आदमी मोहब्बत में सब को भूल जाता है

बाक़ी ही क्या रहा है तुझे माँगने के बाद

बस इक दुआ में छूट गए हर दुआ से हम

इश्क़ के मराहिल में वो भी वक़्त आता है

आफ़तें बरसती हैं दिल सुकून पाता है

क़ितआ 13

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