ग़ज़ल 6

शेर 5

कभी मंदिर कभी मस्जिद पे है इस का बसेरा

धरम इंसानियत का बस कबूतर जानता है

देर तक साथ भीगे हम उस के

हम ने यूँ कामयाब की बारिश

यूँ तो सफ़र किया है कितने ही रास्तों पर

लेकिन तिरे ही घर का रस्ता पसंद आया

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