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अम्न इक़बाल

2000 | लखनऊ, भारत

अम्न इक़बाल

ग़ज़ल 8

अशआर 8

देखता रोज़ है वो मुझ को मगर जाने क्यों

चाँद से अपनी कोई बात नहीं होती है

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उन की ख़ुशबू से महकती हैं हज़ारों सदियाँ

फूल जो राह-ए-मोहब्बत में बिखर जाते हैं

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तेरे बस में है मो'तबर कर दे

मैं हूँ क़तरा मुझे गुहर कर दे

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देख कर तुझ को आज बरसी हैं

एक मुद्दत से ख़ुश्क थीं आँखें

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वस्ल की राह निकालें तो निकल सकती है

हिज्र ही अपना मुक़द्दर हो ज़रूरी तो नहीं

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