अनीस अहमद अनीस
ग़ज़ल 7
नज़्म 1
अशआर 9
अब ग़म का कोई ग़म न ख़ुशी की ख़ुशी मुझे
आख़िर को रास आ ही गई ज़िंदगी मुझे
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मैं वो रिंद-ए-नौ नहीं हूँ जो ज़रा सी पी के बहकूँ
अभी और और साक़ी कि मैं फिर सँभल रहा हूँ
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गवारा ही न थी जिन को जुदाई मेरी दम-भर की
उन्हीं से आज मेरी शक्ल पहचानी नहीं जाती
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कभी इक बार हौले से पुकारा था मुझे तुम ने
किसी की मुझ से अब आवाज़ पहचानी नहीं जाती
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उधर वो अहद-ओ-पैमान-ए-वफ़ा की बात करते हैं
इधर मश्क़-ए-सितम भी तर्क फ़रमाया नहीं जाता
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