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अंजुम ख़याली

1936 - 1997 | इंग्लैंड

ग़ज़ल 12

शेर 15

कोई तोहमत हो मिरे नाम चली आती है

जैसे बाज़ार में हर घर से गली आती है

कुछ तसावीर बोल पड़ती हैं

सब की सब बे-ज़बाँ नहीं होतीं

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मिरे मज़ार पे कर दिए जलाएगा

वो मेरे ब'अद मिरी ज़िंदगी में आएगा

अँधेरी रात है साया तो हो नहीं सकता

ये कौन है जो मिरे साथ साथ चलता है

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बाज़ वादे किए नहीं जाते

फिर भी उन को निभाया जाता है