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अंजुम रहबर

1962 | भोपाल, भारत

मुशायरों की लोकप्रिय कवयित्री

मुशायरों की लोकप्रिय कवयित्री

अंजुम रहबर

ग़ज़ल 6

अशआर 7

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं

यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं

माँ मुझे देख के नाराज़ हो जाए कहीं

सर पे आँचल नहीं होता है तो डर होता है

तुझ को दुनिया के साथ चलना है

तू मिरे साथ चल पाएगा

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दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में

मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

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क़ितआ 8

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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