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आरिफ़ इमाम

ग़ज़ल 13

अशआर 13

तलाश-ए-रिज़्क़ का ये मरहला अजब है कि हम

घरों से दूर भी घर के लिए बसे हुए हैं

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अभी तो मैं ने फ़क़त बारिशों को झेला है

अब इस के ब'अद समुंदर भी देखना है मुझे

तुम्हारे हिज्र में मरना था कौन सा मुश्किल

तुम्हारे हिज्र में ज़िंदा हैं ये कमाल किया

बना रहा हूँ अभी घर को आइना-ख़ाना

फिर अपने हाथ में पत्थर भी देखना है मुझे

हवस जान तुझे छू के देखना ये है

तुझे ही देख रहे हैं कि ख़्वाब देखते हैं

वीडियो 4

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

आरिफ़ इमाम

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आरिफ़ इमाम

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